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युग प्रवर्तक डॉo भीमराव अम्बेडकर

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कुछ लोग थे जो वक्त के सांचे में ढल गए कुछ लोग थे जो वक्त का सांचा बदल गए। आप सभी को अपनी श्रद्धा निवेदित करते हुए बताना चाहूंगा कि भारत के मूल निवासियों का उद्धार करने वेजुबानांे को जुबान, वहरों को कान, भारत को संविधान, दलितों, पिछड़ों, शोषितों को सम्मान दिलाने वाले महान बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक ऐसा नाम, एक ऐसा जीवन, एक ऐसा कर्मशील योद्धा, जिसकी करुणा ने मानवता का, जिसके विचारों ने इतिहास का, जिसके संकल्पो ने वास्तविक अर्थाे में वक्त का सांचा बदल दिया। आज से 134 वर्ष पूर्व 1891 में 14 अप्रैल को सूरज ऐसे ही निकला होगा, जैसे आज निकला है, हवाओं में ऐसी ही नमी होगी जैसी आज है, इनका जन्म आज ही के दिन महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक छोटे से गांव मऊ छावनी में माता भीमाबाई की कोख से हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी राम सतपाल थास इनके पूर्वज महार जाति के थे जिन्हें हिंदू समाज में अछूत समझा जाता था। पर वह दिन बाबा साहेब के जन्म के साथ ही मानव सभ्यता के सबसे सुंदर स्मृति के रूप में दर्ज हो गया। जब भीम 2 वर्ष के थे तभी इनके पिता को फौज की नौकरी से अवकाश मिला। अवकाश ग्रहण करने के पश्चात रामजी राम सकपाल दापोली चले आए उन्हें 5 वर्ष की आयु में दापोली में ही उनके बड़े भाई आनंद राव के साथ पढ़ने को बिठा दिया गया। कुछ दिन पश्चात डॉ. भीमराव अंबेडकर की माता का देहांत हो गया। वह अपने अंतिम होनहार पुत्र के महान कृत्यों को नहीं देख सकीं। वह अपने पीछे तीन पुत्र तथा दो पुत्रियां छोड़ गई थी सबसे बड़े पुत्र बलराम उनसे छोटे आनंद राव तथा सबसे छोटे भीमराव थे। मंजुला एवं तुलसी उनकी दो पुत्रियां थीं। पिता रामजी राव सकपाल स्वयं बहुत संयमी थे चौदह वर्ष तक उन्होंने स्कूल में हेड मास्टर के रूप में सेवा की थी, इसलिए वह शिक्षा और अनुशासन पर हमेशा ध्यान देते थे। वे शिक्षा के अलावा अपने बच्चों को ज्योतिबा फुले की शिक्षाओं से अवगत कराते थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर का पूरा परिवार कबीर का भक्त था कबीर का उपदेश मानवतावादी था लेकिन कबीर के मानवतावादी उपदेश बालक भीमराव के स्कूल के दिनों में कोई सहयोग नहीं कर सके, क्योंकि विद्यालयों एवं समाज में उन दिनों छुआछूत का बोलबाला था। उनके साथ बचपन से ही अमानवीय व्यवहार होने लगे थे इन्हें स्कूल की कक्षा में एक कोने में बैठा दिया जाता था। जब इन बच्चों को प्यास लगती थी तो इन्हें बर्तन नहीं छूने दिए जाते थे। तमाम अमानवीय अत्याचारों को सहते हुए भीम ने हिम्मत नहीं हारी। डॉ. भीमराव अंबेडकर को बचपन से ही महसूस हो चुका था कि अछूत जातियों पर कितने जुल्म ढाए जाते हैं। यहां अथक प्रयासों के बाद उन्होंने मुंबई एलफिंस्टन राजकीय स्कूल से सन 1907 में हाई स्कूल की परीक्षा पास कर ली, तत्पश्चात इंटर की परीक्षा पास करने के बाद में आगे पढ़ना चाहते थे। पिता की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण आगे की पढ़ाई होना कठिन था परंतु राजा बड़ौदा ने भीमराव पर कृपा की और पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति प्रदान कर दी। भीम के लिए यह सुनहरा मौका था उन्होंने 1912 में बीए की परीक्षा पास कर ली इसके पश्चात भीम को बड़ौदा राज्य की फौज में लैफिटनेंट के पद पर नियुक्त कर दिया गया। 15 दिन नौकरी करने के पूर्व उन्हें पिता की बीमारी का तार मिला और वह तुरंत घर लौट आए। यह देख रामजी राम बहुत खुश हुए यहां बेटे को आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम इस योग्य बनो कि दीन दुखियों की सेवा कर सको। इसके बाद रामजी राव ने 2 फरवरी 1913 को अंतिम सांस ली। पिता की मृत्यु के बाद भीम ने ज्ञान की जिज्ञासा के प्रति मुंह नहीं मोड़ा, परंतु निर्धनता उनके मार्ग में रुकावट पैदा करने लगी। महाराजा बड़ौदा की एक और अनुकंपा से भीम ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से सन 1915 में एम.ए. व सन 1916 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद बैरिस्टर एट ला की शिक्षा प्राप्त की। डॉ.भीमराव अंबेडकर के पास 32 डिग्रियां थी और नौ भाषाओं के ज्ञाता थे इन्हें सन 1990 में भारत रत्न पुरस्कार दिया गया। भीमराव ने स्वदेश लौटने के बाद देश के गुलाम समाज को मुक्त कराने का बीड़ा उठाया। उन्होंने करोड़ों अछूतों को सम्मान से रहने का संदेश दिया कहां कि स्वतंत्रता दान में नहीं मिलती है इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने मूकनायक व बहिष्कृत भारत नामक समाचार पत्रिका का संपादन किया। उन्हें उनके सामाजिक कार्यों के कारण मुंबई विधान परिषद का सदस्य बनाया गया। वहीं सन 1935 में राजकीय लॉ कालेज मुंबई का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया, जिसका भारी विरोध हुआ। उन्होंने अछूतों के उद्धार के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की। यहां विरोध के कारण 1932 में मजबूरन डॉ. भीमराव अंबेडकर को पूना पैक्ट करना पड़ा। स्वतंत्रता के पश्चात डॉ. भीमराव अंबेडकर को भारत का प्रथम कानून मंत्री बनाया गया। 29 अगस्त 1947 को उन्हें संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यहां उन्होंने संविधान की रचना कर भारत के चहुंमुखी विकास के रास्ते खोल दिए। संविधान के मुख्य वास्तुकार एवं मसौदा समिति के अध्यक्ष रहे बाबा साहब को अपने व्यक्तिगत जीवन में जाति व्यवस्था के तंज भेदभाव एवं असमानता को सहना पड़ा। उन्होंने अपनी उस व्यक्तिगत पीड़ा को सामूहिक मुक्ति के स्वप्न में बदल दिया। उन्होंने तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध जाकर महिलाओं को शिक्षा, अधिकार, गरिमा, लैंगिक समानता के लिए अभूतपूर्व ढंग से आवाज उठाई और उसको हासिल करने के लिए जोरदार संघर्ष किया। वह कहते थे कि मैं किसी समुदाय की प्रगति उस डिग्री से नापता हूं जो महिलाओं ने हासिल की है। बाबा साहब का यह योगदान महिलाओं के हक में जाहिर इतिहास का सर्वाधिक उज्जवल ज्योति पत्र है। उन्होंने दुनिया के संपूर्ण धर्मों का अध्ययन करने के पश्चात 14 अक्टूबर सन 1956 को एक विशाल जनसमूह के साथ हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। इस वक्त उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म भारतीय संस्कृति सभ्यता का अंग है। डॉ. भीमराव अंबेडकर आजीवन बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करते हुए 6 दिसंबर 1956 को इस दुनिया से चल बसे। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर व्यापक अर्थाे में एक बड़े नेता, समाज सुधारक और परिवर्तन धर्मी थे। वह अपने समय के अनेक स्थापनाओं और संरचनाओ से असहमत थे, किंतु उनकी असहमति रचनात्मक थी। बाबा साहब ने भारत को समझने, भारत से असहमत होने और भारत को बदलने का भारतीय ढंग दिया। जिस पर हाथ रखकर देश प्रेम की सौगंध खाई जा सकती है। यही बाबा साहेब की असहमति का अभिनव सौंदर्य शास्त्र है। आज इतिहास के इस मोड़ पर बाबा साहेब के योगदान को किसी एक विषय, जाति और वर्ग से जोड़कर देखना उनके योगदान को सीमित करना है। बाबा साहब जैसे व्यक्तित्व उन सबके हैं जिन्हें लोकतंत्र पर भरोसा है, जिन्हें मानवीय करुणा और तार्किकता पर भरोसा है, जो प्रत्येक प्रकार की गैर बराबरी को अमानवीय मानते हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपनों को साकार करना व उनके आदर्शों पर चलना ही उनके 134 वे जन्मदिन पर कृत राष्ट्र की ओर से उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
हर्षवर्धन
ग्राम सिसईया,तहसील बिसौली,जिला बदायूं
9719347525


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