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“नारी की गरिमा “

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सहनशीलता, संघर्ष, गरिमा की कहानी
नारी तुमने हर पृष्ठ पर उकेरी है
मन परिंदे सा उड़ा
लांघी ना घर की देहरी है

लड़ी स्वयं से ही तुम
स्वयं से ही जीत तुमने पायी है
समझे थे जो संस्कारो को कमजोरी
चुप्पी का तमाचा दे उन्हें
तुमने लोक मर्यादा निभायी है

कहीं तुम जनक की सीता
कहीं दशरथ की कुल मर्यादा हो
कहीं सामाजिक तानों की
अग्नि में जलती ज्वाला हो

पुरुष ने जब भी तुम्हें
तानाशाही बेड़ियों में बाँधना चाहा
अपने मन के द्वंद को
नारी तुमने बखूबी निभाया
काट दिए गए तुम्हारे पर
उड़ान भरने से पहले
तुम्हें गिरता देख पुरुष ने
इसे अपना पुरुषत्व समझाया

कई दर्द जो आज भी
तुम्हारे अंतस में कैद है
अश्रु आज भी कहीं तो
प्रवाहित होने के संकोच में है
तुम्हारे मर्म जो कभी भी
मुख से प्रस्फुटित हुए ही नहीं
नारी तुम्हारा जीवन आज भी
एक आप्रकाशित किताब ही है

प्रीति अरोरा(लेखिका)
बदायूं, उत्तर प्रदेश


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