Breaking News

मुहर्रमुल हराम खुशियों, शहादत की सआदत और हक़ पर इस्तिक़ामत का महीना है : मुफ़्ती अबुल कलाम हलीमी*

Spread the love

*
___________________________

*लखनऊ:* ऑल इंडिया सुन्नी मूवमेंट के तत्वावधान में आयोजित भव्य धार्मिक एवं सुधारात्मक “जलसा-ए-शोहदा-ए-इस्लाम” बर्फ़खाना, मुसाहिबगंज, ठाकुरगंज, लखनऊ में श्रद्धा एवं गरिमा के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता ऑल इंडिया सुन्नी मूवमेंट के अध्यक्ष सैयद बिलाल नूरानी ने की, जबकि संचालन महासचिव डॉ. मोहम्मद मतीन ख़ान ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ हाफ़िज़ मोहम्मद अहमद की भावपूर्ण क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुआ। इसके बाद शायर मोहम्मद उसामा, हाफ़िज़ मोहम्मद साद और मोहम्मद इमरान ने नात व मनक़बत पेश कर उपस्थित जनसमूह को आध्यात्मिक वातावरण से सराबोर कर दिया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उलेमा, इमाम, बुद्धिजीवी एवं आम नागरिक उपस्थित रहे।

अपने संबोधन में प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना मुफ़्ती अबुल कलाम हलीमी ने कहा कि मुहर्रमुल हराम इस्लामी वर्ष का पहला महीना है, जो अपने दामन में अनेक महान शहादतों की सआदत और इज़्ज़त समेटे हुए है। यदि हज़रत हुसैन (रज़ि.) की शहादत इस महीने की सबसे महान घटना है, तो यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या केवल हज़रत हुसैन (रज़ि.) ही की शहादत मुहर्रम में हुई? और क्या शहादत का अर्थ केवल शोक, दुःख और आँसू बहाना है?

उन्होंने कहा कि इस्लामी इतिहास स्वयं इसका स्पष्ट उत्तर देता है। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) की शहादत भी मुहर्रम में हुई। इसके अतिरिक्त हज़रत उस्मान ग़नी (रज़ि.), सय्यिदुश्शुहदा हज़रत हमज़ा (रज़ि.) तथा अनेक महान सहाबा-ए-किराम ने भी अल्लाह की राह में शहादत का उच्चतम दर्जा प्राप्त किया। इसलिए मुहर्रम की महानता केवल एक ऐतिहासिक शहादत के कारण नहीं, बल्कि इसलिए भी है कि अल्लाह तआला ने इसे सृष्टि के आरंभ से ही पवित्र महीना बनाया है।

मुफ़्ती हलीमी ने कहा कि इस्लाम में शहादत ग़म का नहीं बल्कि इज़्ज़त, सआदत और स्थायी सफलता का प्रतीक है। हज़रत  हुसैन (रज़ि.) की कुर्बानी उम्मत को सब्र, दृढ़ता, सत्य पर अडिग रहने और अत्याचार के सामने न झुकने का संदेश देती है। कर्बला का पैग़ाम निराशा नहीं, बल्कि हिम्मत, त्याग, बलिदान और दीन पर अटल रहने का संदेश है।

उन्होंने अपने भाषण में हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) की उस दुआ का भी उल्लेख किया, जो वे किया करते थे कि, “ऐ अल्लाह! मुझे अपनी राह में शहादत अता फ़रमा और मेरी मौत अपने रसूल के शहर मदीना में मुक़द्दर फ़रमा।”

उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला ने अपनी शान-ए-करीमी से हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) की दोनों दुआएँ स्वीकार कीं और उन्हें मदीना मुनव्वरा में शहादत की महान सआदत प्रदान की। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि अल्लाह तआला अपने नेक बंदों की सच्चे दिल से की गई दुआओं को ऐसे तरीक़े से क़बूल करता है जिसकी इंसान कल्पना भी नहीं कर सकता।

अंत में उन्होंने कहा कि हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ि.) की शहादत इस बात की रौशन दलील है कि शहादत अहले-ईमान की आरज़ू, अंबिया और सालेहीन की तमन्ना तथा अल्लाह तआला की महान नेमतों में से एक महान नेमत है।


Spread the love

About Govind Deval

Check Also

भारत अमेरिका कृषि समझौता के खिलाफ ज्ञापन सौंपा

Spread the loveआज बदायूं जिला कलेक्ट्रेट में किसान एकता संघ के पदाधिकारियों के साथ भारत …

error: Content is protected !!