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जब किसी क़ौम की जवानी बिगड़ जाए, तो समझो उसका मुस्तक़बिल अंधेरे में डूब चुका है

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बदायूं। जब किसी क़ौम की जवानी बिगड़ जाए, तो समझो उसका मुस्तक़बिल अंधेरे में डूब चुका है। आज हमारी नई नस्ल जिस खतरे की गिरफ़्त में है, वह है नशा ख़ोरी। एक ऐसी लानत, जो जिस्म को नहीं, रूह को भी ज़ख़्मी कर देती है। हाफिज शरीफ जामी ने अपने संबोधन में कहा कि मैंने देखा है कि किस तरह तालीमगाहों के गुलशन में खिले हुए फूल, हमारे नौजवान नशे की आग में झुलस रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो आंखें जो किताबों में रोशनी तलाश करती थीं, अब धुंए में खोती जा रही हैं। ये आलम देखकर दिल काँप उठता है, आंखों से आँसू टपकते हैं। नशा महज़ एक आदत नहीं, एक बर्बादी की दास्तान है। सिगरेट से शुरू होकर शराब, चरस, हेरोइन और न जाने कौन-कौन से ज़हर इंसान को इंसान से जानवर बना देते हैं। वह न घर का रह जाता है, न बाहर का। ऐसे नौजवान जो कल इस मुल्क की बागडोर संभालने वाले थे, वह आज अपने होश खो बैठे हैं। श्री जामी ने कहा कि माँ-बाप की उम्मीदें टूट रही हैं, घरों में वीरानी छा रही है। ये सिर्फ़ एक शख्स की तबाही नहीं, पूरी नस्ल की बर्बादी है। हक़ीक़त ये है कि इस वबा से लड़ने के लिए सिर्फ़ हुकूमत की तदबीर काफ़ी नहीं। हर घर, हर स्कूल, हर मस्जिद, हर इदारा सबको मिलकर आवाज़ उठानी होगी। उन्होंने कहा कि मां-बाप को चाहिए कि बच्चों से दोस्ती करें, उनसे खुलकर बात करें। उस्तादों को चाहिए कि वो तालीम के साथ तरबियत का भी फर्ज़ अदा करें। मस्जिद और मदरसे, जिन्हें मरकज़ बनना था नूर का, उन्हें चाहिए कि इस अंधेरे को दूर करने के लिए मिंबर से आवाज़ बुलंद करें। हाफ़िज़ शरीफ़ जामी ने अपील की कि वह दिल की गहराई से ये पैग़ाम देना चाहता हूँ “ऐ नौजवान! तू किताब से रिश्ता जोड़, नशे के गिलास से नहीं। तेरी आँखों में रोशनी होनी चाहिए, धुआं नही”। अगर आज हमने अपनी नई नस्ल को न बचाया, तो कल का इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। “नशा छोड़ो, ज़िन्दगी अपनाओ, क़लम थामो, जहर नहीं।”


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