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हर हर शम्भो ! बं बं शम्भो !

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सुनसान भयानक निर्जन तट
अलसायी कालरात्रि बिखरी
छितरा-छितरा सा क्षीरोदधि
मंथन से ऐसा पस्त हुआ
जैसे जूड़ी से ग्रस्त हुआ
अब कोई ज्वार न उठता है
गर्जन का कोई लेश नहीं
जो शोर घड़ी भर पहले था
उसका कोई अवशेष नहीं

हाँ अभी घड़ी भर पहले ही
इस तट पर नूपुर छनके थे
उस विश्वमोहिनी के पग से
टूटे हो मनके मनके थे
मैं नहीं मरूँ, मैं नहीं मरूँ
इस हेतु सुधा दो बूँद मिले
अमरत्व प्राप्ति के लिए यहीं
सब लड़-मरने को विकल हुए।

सब रत्न छाँट कर बाँट लिए
ले गए सुधा घट देव सकल
दैत्यों के चमू निढाल हुए
सब लौट गए हैं हार मान।
सागर तट यह अब निर्जन है
निर्धन है अब यह रत्न खान।

लेकिन यह कौन ? कौन है यह ?
जोगी, वैरागी, दिगम्बरी
जो अब तक तट पर बैठा है
वीराने को आबाद किये।
है जटाजूट से संन्यासी
चेहरे से कोई राजा है
कर्पूरगौरवर्णी छवि के
कंठस्तल पर नीला टीका ?

उठकर सागर की ओर चला
उस ओर जहाँ मंदराचल है
उस ओर जहाँ रक्तिम जल है
उस ओर जहाँ रस्सी बनकर
लिपटा वह वासुकि घायल है
ओह, मंदराचल को खिसका कर
कच्छप को मुक्त किया इसने
पर्वत को स्नेहिल थपकी दे
आँसू से सिक्त किया इसने

पर हा ! वासुकि का हाल देख
उधड़ी उधड़ी वह खाल देख
नयनों में पीर विशाल देख
हाथों में उठा लिया वासुकि
चूमा, दुलराया, झुला दिया
गर्दन में डाल लिया वासुकि।।
ये तो शिव हैं, ये शिव ही हैं
दीनों के सखा, दयानिधि प्रभु
आशा, करुणा के महासिंधु।
इसलिए कहे जाते महेश,
देवाधिदेव वे महादेव !
हर हर शम्भो ! बं बं शम्भो !
हर हर शम्भो ! बं बं शम्भो !
….. …. … … …. …. … … …
–
जय शिव
–
आदित्य तोमर,
वज़ीरगंज, बदायूँ (उ.प्र.)


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