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उस्ताद शायर ख़ालिद नदीम नहीं रहे

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उस्ताद शायर ख़ालिद नदीम नहीं रहे

बदायूं। उर्दू अदब का एक चमकता सितारा आज हमेशा के लिए रुख़्सत हो गया। नामचीन शायर ख़ालिद नदीम बदायूंनी का शनिवार को निधन हो गया। वे 67 वर्ष के थे।

ख़ालिद नदीम उन विरले शायरों में से थे जिन्होंने शायरी को सिर्फ़ जज़्बात की जुबान नहीं, समाज की आवाज़ बना दिया। उनकी रचनाओं में दर्द भी था, सोच भी, और एक ख़ामोश मगर असरदार प्रतिरोध भी। कभी वे बेबसी को यूँ लफ़्ज़ देते थे:
ख़ुद अपनी शय पे अधूरा है इख़्तियार मुझे,
गिरा तो सकता हूँ आँसू, उठा नहीं सकता।

तो कभी मुफ़लिसी की ख़ामोशी में भी बयान का हुनर ढूँढ़ लेते:
अब जो चाहो वो फ़ैसला कर लो,
मुफ़्लिसी अपने होंट सी आई।

वे सिर्फ़ शायरी में ही नहीं, अदबी सरगर्मियों में भी उतने ही सक्रिय और योगदानकारी थे। उन्होंने सैकड़ों मुशायरों, काव्य-गोष्ठियों और साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन किया, जहाँ न केवल शब्दों का जश्न मनाया गया, बल्कि नए और युवा कलाकारों को मंच भी मिला।

उन्हें आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से भी देशभर में सुना गया। वे दिल्ली, रामपुर, लखनऊ, भोपाल, हैदराबाद जैसे बड़े शहरों के प्रतिष्ठित मंचों पर बार-बार आमंत्रित किए जाते रहे।

उनकी कोशिशें सिर्फ़ अपनी आवाज़ तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने विभिन्न शायरों की पुस्तकों के प्रकाशन में सहयोग कर, उर्दू अदब को ज़मीनी स्तर से मजबूती दी। वे उन चंद लोगों में थे जो दूसरों के नाम को भी रौशन करने में यक़ीन रखते थे।

उनके शागिर्दों की एक लंबी और समर्पित जमात आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में उनके नाम और अंदाज़ को आगे बढ़ा रही है।

ख़ालिद नदीम की शायरी में जब विरोध भी होता था, तो तहज़ीब के साथ:
वो एक शख़्स तो पत्थर उछाल कर चुप है,
समुंदरों से अभी तक सदाएँ आती हैं।

आज वो हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनके अशआर, उनकी मेहनत और उनकी सोच आने वाली नस्लों के लिए एक रौशन मशाल बनकर जलते रहेंगे।

ख़ालिद नदीम बदायूंनी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, वे एक दौर थे और वो दौर यूँ कभी ख़त्म नहीं होता।


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