दक्षयज्ञविध्वंस
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उखड़ा-उखड़ा हर शिलाखण्ड, विध्वंसित वृक्षों की कतार।
प्राचीरें, अट्टालिका, कँगूरे दग्ध, भग्न, विनशित, भयार।।
फहरते गगनध्वजकेतु, पताकाएँ या बंदनवार द्वार। पुष्पावलि, हारावलि, माला, तोरण लकदक मण्डपाकार।।
विच्छिन्न, धूलधूसरित, प्लुष्ट, फेंकते सघनतम धूम्रज्वार।
हर ओर भयंकर भयासिक्त कातर क्रन्दन की थी पुकार।।
प्रातः तक विक्रीड़ित निढाल बैठे हैं एक ओर थमके।
यमपुरी और कनखल तक चलते रहे रात्रिभर गण यम के।।
कनखल वन का अणु-अणु, कण-कण, रह रहकर धूँ धूँ धधक रहा।
काली का क्लेंकार गर्जनस्वर वीरभद्र का गमक रहा।।
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बीती निशि आया उषाकाल पर दिखा नहीं अरुणोन्मेष।
लगता था चले गए भय से वे सूर्यदेव तजकर प्रदेश।।
पूरब से काली घटा घिरी, पश्चिम में आँधी वेगवान।
दोनों ने उत्तर में आकर बन चक्रवात साधी कमान।।
तब और एक स्वर घहराया, लहराया उत्तर का पहाड़।
हर हहर हहर कर गूँज उठी क्रोधित सुरसरिता की दहाड़।।
कण कण खल रहा नयन में तो गंगा ने आ घेरा कनखल।
जो कुछ छोड़ा था लपटों ने, लहरों ने वह भी लिया निगल।।
थामे लहरों की कटु कटार, ले बहा चली ध्वंसावशेष।
उस ओर सती के शव को पर, शंकर तकते थे निर्निमेष।
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नयनों से लोहू छलक छलक अधरों तक करता था प्रसार।
पुरध्यानमग्न पर भग्नहृदय भीतर बहता था चीत्कार।।
वेदना हृदय की श्यामघटा बन हुई क्षितिज पर भासमान।
शिव रो न सके उनके बदले रो पड़ा फफककर आसमान।।
बिजली दमकी, बादल फूटे, टूटी ओलों की कठिन मार।
बूंदों की जगह बरसते थे, प्रलयंकर विद्युत के प्रहार।।
दिन बीता रात गयी क्षण में, फिर मास, मास से गए वर्ष।
अपलक, अविचल, निःश्वास खड़े शिव का न घटा भीतर अमर्ष।।
तब वीरभद्र की विनती पर मचले पथराए तीन नेत्र।
ओ सती, उठो, अब चलते हैं, सूना तुम बिन कैलाश क्षेत्र।।
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आदित्य तोमर
वजीरगंज, बदायूँ
28/08/2025
Budaun Amarprabhat