मनुष्य का समग्र विकास उसकी अदम्य जिज्ञासा, असीम उत्साह, जिजीविषा और निरंतर उन्नति की आकांक्षा का प्रतिफल है। सभ्यता और संस्कृति के विकास-पथ पर मूल्यों का पुनर्संयोजन और परिवर्तन सृष्टि का स्वाभाविक क्रम है, क्योंकि परिवर्तन ही प्रकृति का सनातन नियम है।
विकास के पथ पर धन की भूमिका अवश्य है, परंतु जब धन स्वयं लक्ष्य बन जाए तो वह दिशा को दिग्भ्रमित कर देता है। परिस्थितियों, आवश्यकताओं और युगीन दर्शन के अनुरूप समाज का दृष्टिकोण निरंतर परिवर्तित होता रहता है, किंतु सत्य — वह तत्व है जो समय, देश, समाज, धर्म और संस्कृति से परे, सर्वकालिक और सर्वमान्य बना रहता है।
आदिकाल से ही मानव जीवन में धन और सत्य दोनों की अपनी विशिष्ट भूमिका रही है। धन जीवन की सुविधा का साधन है, जबकि सत्य उसके अस्तित्व का आधार। धन का महत्व है, परंतु धनबल सब कुछ नहीं। सत्य वह दिव्य आलोक है जो अंधकार के पार भी अपनी ज्योति बनाए रखता है।
महात्मा गांधी ने कहा था — “सत्य ही ईश्वर है और ईश्वर ही सत्य।”
गांधीजी का सम्पूर्ण जीवन इस उद्घोष का साक्षात् रूप था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सत्य केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन की जीवन्त ऊर्जा है। स्वामी विवेकानंद भी कहते हैं — “सत्य में वह शक्ति है जो मानव को असीम बल प्रदान करती है; जो सत्य का पालन करता है, उसे कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती।” वेदों और उपनिषदों में भी सत्य को सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। “सत्यमेव जयते नानृतं” — (मुंडक उपनिषद) — यह केवल वाक्य नहीं, भारतीय जीवन-दर्शन का सार है।
भारतीय परंपरा में सत्य को मन, वचन और कर्म की एकता में देखा गया है — ‘सांच को आंच नहीं’ जैसी लोक कहावतें इसी शाश्वत सत्य की जनभाषा में व्याख्या हैं। महात्मा बुद्ध ने कहा — “तीन बातों को लंबे समय तक छिपाया नहीं जा सकता: सूर्य, चंद्रमा और सत्य।”
सुकरात ने भी सत्य के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, पर अपने सिद्धांत से विचलित नहीं हुए।
इमैनुएल कांट ने अपनी नैतिक दार्शनिकता में कहा — “सत्य बोलना नैतिक कर्तव्य है, चाहे उसके परिणाम कुछ भी हों।” लियो टॉलस्टॉय ने इसे मानवीय आत्मा की सर्वोच्च अवस्था माना — “सत्य वही है जो आत्मा को स्वतंत्र करता है।”
वेदों में कहा गया है — “सत्य का सुख स्वर्ण-पात्र से ढका हुआ है।”
जब धन मुखर होता है, तब सत्य नेपथ्य में चला जाता है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब धनबल और सत्ता ने नैतिकता को निगला, तब-तब सभ्यताओं ने पतन देखा है। धन का अतिरेक समाज को नैतिक भ्रम में डाल देता है; भोग और उपभोग की संस्कृति में त्याग, संयम और संतुलन जैसे मूल्य विलुप्त होते जाते हैं।
पश्चिमी औद्योगिक क्रांति के पश्चात धन का प्रभाव वैश्विक स्तर पर इतना बढ़ा कि समाज, राजनीति, धर्म, यहां तक कि शिक्षा और अध्यात्म भी आर्थिक निर्देशों के अधीन होते चले गए। आज धन का नियंत्रण इतना व्यापक है कि राजनीति, न्यायपालिका, मीडिया — सब उसके प्रभाव क्षेत्र में हैं। न्याय भी अब महंगा हो गया है — जैसे विवेक की जगह अब मूल्य (Price) ने ले ली हो।
परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि सत्य का दमन कभी स्थायी नहीं होता।
धन के पास सत्ता है, पर सत्य के पास स्थायित्व।
धन आकर्षक है, पर सत्य आत्मिक।
धन बदलता है, सत्य बना रहता है।
आधुनिक वैश्वीकरण के इस युग में जब सब कुछ खरीदा-बेचा जा सकता है, तब भी सत्य की किंमत लगाना असंभव है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था — “जो सत्य की खोज में नहीं है, वह जीवन की सबसे बड़ी यात्रा से वंचित है।”
रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में — “सत्य ही ईश्वर का दूसरा नाम है; जो सत्य को जानता है, वही ईश्वर को जानता है।”
आज का युग धन, सत्ता और प्रभाव का युग अवश्य है, पर वह मानवता का युग तभी बनेगा जब उसमें सत्य का आलोक व्याप्त होगा।
सत्य जीवन का शाश्वत आधार है — यह किसी ग्रंथ, धर्म या राष्ट्र की सीमा में बंधा नहीं; यह मानव चेतना की आत्मा है।
स्वामी विवेकानंद के शब्दों में —
“यदि तुम अखंड सत्य का पालन करो, तो कोई भी तुम्हें रोकने में समर्थ नहीं है।” सत्य ही वह शक्ति है जो मानवता को जोड़ती है, उसका मार्ग आलोकित करती है और हर युग में उसे पुनः जाग्रत करती है। धन के युग में भी सत्य ही मानव सभ्यता का अंतिम और सर्वोच्च विजेता है —
“सत्यमेव जयते।”

संजीव ठाकुर
चिंतक, लेखक, स्तंभकार
रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415
चिंतक, लेखक, स्तंभकार
रायपुर छत्तीसगढ़, 9009 415 415
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