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दीपावली -धर्म, सत्य और न्याय की पुनर्स्थापना का उत्सव

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“तमसो मा ज्योतिर्गमय”
दीपावली भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है जिसमें मानव, प्रकृति और ईश्वर के बीच का समन्वय सबसे गहराई से प्रकट होता है। यह केवल दीप जलाने या घर सजाने का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा और चेतना में प्रकाश भरने का संस्कार है। सनातन धर्म के अनुसार अंधकार केवल बाह्य नहीं, वह अज्ञान, लोभ, क्रोध और मोह का प्रतीक है, और दीपक का प्रकाश इन तामसिक प्रवृत्तियों से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। ऋग्वेद का मंत्र “तमसो मा ज्योतिर्गमय” दीपावली का मूल तत्व है, जो यह सिखाता है कि मनुष्य की यात्रा अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य और मृत्यु से अमरत्व की ओर होनी चाहिए। जब भगवान श्रीराम वनवास से लौटे, तो अयोध्या की प्रजा ने दीप जलाकर न केवल एक राजा का स्वागत किया, बल्कि धर्म, सत्य और न्याय की पुनर्स्थापना का उत्सव मनाया। यह दीपावली का सनातन प्रतीक है—अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय। दीपक हमारे पांच तत्वों का संगम है—मिट्टी पृथ्वी का प्रतीक, तेल या घी जल तत्व का, लौ अग्नि का, लहराती हवा वायु का और उसकी चमक आकाश का। इस प्रकार प्रत्येक दीप मानव के पंचभूत शरीर और ब्रह्मांड के एकत्व का स्मारक है। परंतु आज के आधुनिक परिवेश में दीपावली का स्वरूप बदल रहा है। जो पर्व आत्मा के प्रकाश का था, वह अब भौतिक चमक-दमक का हो चला है। धर्म के स्थान पर व्यापार और प्रतिस्पर्धा ने जगह बना ली है। दीप के अर्थ का विस्थापन हो रहा है—जहाँ पहले मिट्टी के दीप घरों की आत्मीयता जगाते थे, अब बिजली की झालरें और आतिशबाजी केवल दृश्य चकाचौंध उत्पन्न करती हैं। फिर भी इस उत्सव की सामाजिक भूमिका अब भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यह पर्व लोगों को जोड़ता है, परिवारों को निकट लाता है, रिश्तों में ऊष्मा भरता है। यह समय है जब समाज में सहअस्तित्व की भावना प्रबल होती है, और सनातन संस्कृति की “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” की अवधारणा सजीव रूप में दिखाई देती है। दीपावली आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी पर्व है—यह लघु उद्योगों, कुम्हारों, शिल्पकारों, कृषकों और व्यापारियों के जीवन में समृद्धि का अवसर लाती है। इसके अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी यह उल्लास और नवीनता का प्रतीक है—मनुष्य अपने भीतर के अंधकार को पहचानता है और नयी शुरुआत का संकल्प लेता है। परन्तु इसके साथ कुछ गम्भीर हानियाँ भी जुड़ी हैं। सबसे बड़ी हानि यह है कि दीपावली अब धीरे-धीरे उपभोग का प्रतीक बनती जा रही है। अतिशय आतिशबाजी और अपव्यय न केवल पर्यावरण को दूषित करते हैं, बल्कि मूल भाव—प्रकृति के साथ सामंजस्य—को भी आहत करते हैं। यह पर्व जहाँ आत्मावलोकन का माध्यम था, अब प्रदर्शन का माध्यम बन रहा है। सामाजिक स्तर पर भी यह असमानता को बढ़ा रहा है—कहीं करोड़ों की सजावट है तो कहीं अंधेरे में डूबे घर हैं। यही वह विडंबना है जहाँ सनातन धर्म की आत्मा आधुनिकता की प्रतिस्पर्धा में दबती जा रही है।
दीपावली का सच्चा लाभ तभी है जब यह व्यक्ति के भीतर संवेदनशीलता और संतुलन जाग्रत करे। यह पर्व हमें सिखाता है कि प्रकाश बाहरी नहीं, भीतरी हो जो मनुष्य को अहंकार से विनम्रता, और स्वार्थ से परमार्थ की ओर ले जाए। सैद्धांतिक रूप से दीप का अर्थ है मानव चेतना का उर्ध्वगामी प्रयास। जब दीप व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, सामूहिक कल्याण के लिए जलता है, तब वह धर्म बनता है। इसी में सनातन की आत्मा है—जहाँ कर्म, भक्ति और ज्ञान एक साथ आलोकित हों। आज आवश्यकता है कि दीपावली को केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की तरह जिया जाए। मिट्टी का दीप पर्यावरण के प्रति आस्था का प्रतीक बने, दान और सेवा आत्मिक समृद्धि का माध्यम बनें, और उत्सव का स्वरूप सामाजिक समरसता का संदेश दे। धर्म का वास्तविक अर्थ है जो जोड़ता है, और दीपावली वही क्षण है जब यह जोड़ाव सबसे सहजता से संभव है।
हमें यह समझना होगा कि प्रकाश का उद्देश्य केवल दीवारों को जगमगाना नहीं, बल्कि मनुष्य की दृष्टि को उजागर करना है। तभी यह पर्व केवल पर्व नहीं रहेगा, बल्कि संस्कृति का जीवंत संवाद बन जाएगा। इस रूप में दीपावली एक सनातन चिंतन है—प्रकाश, करुणा और सह-अस्तित्व की त्रयी का संगम। जब तक हमारे भीतर एक छोटा दीप जलता रहेगा, तब तक अंधकार किसी युग में स्थायी नहीं रह सकेगा। यही दीपावली का सनातन वचन है—अंधकार मिटाने से पहले अपने भीतर का दीप जलाना।
संजीव ठाकुर
चिंतक, लेखक, स्तंभकार
रायपुर, 9009 415 415,

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