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विश्व हिंदी दिवस पर 114वीं मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन

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चंदौसी। के. बी. हिंदी सेवा न्यास (पंजी.) द्वारा विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर 114वीं मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन न्यास कार्यालय पर किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार हरस्वरूप शर्मा ने की तथा संचालन न्यास के सह सचिव विजय कुमार सक्सेना ‘विजय’ ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों एवं न्यास अध्यक्ष डॉ. सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधांशु’ द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। वाणी वंदना रमेश चन्द्र मिश्र ‘सहज’ ने प्रस्तुत की। इस अवसर पर न्यास अध्यक्ष डॉ. सुधांशु ने विश्व हिंदी दिवस के महत्व पर प्रकाश डालते हुए हिंदी भाषा की विकास यात्रा पर संक्षिप्त एवं सारगर्भित व्याख्यान दिया।
काव्य पाठ की कड़ी में रमेश चन्द्र मिश्र ‘सहज’ ने राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं—
“अभी हुआ सिंदूर अभी तो बिंदी होना बाकी है,
भारत के माथे का पी.ओ.के. लेना बाकी है।”
राजीव कुमार उपाध्याय ने हिंदी की उपयोगिता पर दोहा सुनाया—
“भाषा के उद्यान में, हिंदी अनुपम फूल।
लिखने पढ़ने बोलने, हित सबके अनुकूल।”
चंदौसी से पधारे मुकेश कुमार दीक्षित ‘शिवांश’ ने कहा—
“सबसे प्यारी मेरी हिंदी,
जग में न्यारी मेरी हिंदी।”
डॉ. सुधांशु ने हिंदी के वैश्विक विस्तार पर प्रकाश डालते हुए पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं—
“रूस चीन जापान अरु, सात समंदर पार।
सकल विश्व में हो रहा, हिंदी का विस्तार।”
विजय कुमार सक्सेना ‘विजय’ ने सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत किया—
“मानव की करतूत से, हुए अचंभित श्वान।
लगा चाटने और के, तलवे जब इंसान।”
कु. साक्षी शर्मा ने विश्व हिंदी दिवस पर दोहा सुनाया—
“आज विश्व हिंदी दिवस, मन रहे हम मित्र।
निश्चित ही सुंदर बने, इक दिन हिंदी चित्र।”
रामकृपाल तिवारी ने हिंदी को भारतीय संस्कृति की पहचान बताते हुए कहा—
“संस्कृत से जन्मी संस्कृति की बिंदी हूँ।
मैं भारत जन-जन की भाषा हिंदी हूँ।”
रुद्रांश वत्स भार्गव ने हिंदी को सरसता का स्रोत बताया। श्रीपाल शर्मा ‘नमन’ ने भक्ति भाव से ओत-प्रोत दोहा प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त हरस्वरूप शर्मा, राजेंद्र नाथ, कु. भक्ति शर्मा, कु. स्तुति शर्मा एवं अक्षांश वत्स भार्गव ने भी काव्य पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।
कार्यक्रम में आशुतोष शर्मा, कुसुमलता, ट्विंकल, सुधीर शर्मा सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। अध्यक्षीय उद्बोधन के पश्चात गोष्ठी का समापन हुआ। अंत में डॉ. सुधांशु ने सभी कवियों, अतिथियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।


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