काकोरी काण्ड शताब्दी पर
आये हैं शायर चार याद
पण्डित बिस्मिल अशफाकउल्ला
रौशनसिंह के सँग में आज़ाद
शायर जब काग़ज़ क़लम छोड़
कर में बंदूक उठाता है
तो दसों दिशाओं से मिलकर
बस एक नाद ही आता है
अब बहुत हुआ अब बहुत हुआ
अब अंत किये देते हैं हम
इस धरती के हर इक कण को
अरिहंत किये देते हैं हम
गाने तो बहुत गा चुके अब
बारूदी फसल उगाएँगे
फसलों की बाली बाली पर
अंगारे फलते जाएँगे
अशफ़ाक़ सदा शफ्फाक़ रहें
रौशनसिंह रौशन रहे नाम
लाहिड़ी और बिस्मिल तुम तो
भारत माँ के सुत हो ललाम
तुमको प्रणाम तुमको प्रणाम
तुमको प्रणाम तुमको प्रणाम
–
आदित्य तोमर
वज़ीरगंज, बदायूँ
Budaun Amarprabhat