यह सर्वविदित है कि भारत त्योहारों और पर्वों की भूमि है — एक ऐसा देश, जहाँ ऋतुएँ बदलती हैं तो उनके साथ लोक-जीवन में उल्लास की नई धारा प्रवाहित हो उठती है। भारत का प्रत्येक उत्सव केवल आनंद का अवसर नहीं, बल्कि संस्कृति, श्रद्धा, कृतज्ञता और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। इन्हीं पर्वों में दीपावली का स्थान सर्वोच्च और सर्वप्रिय है। आज दीपावली की ज्योति केवल भारत के आँगन में ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में प्रज्वलित होती है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, चीन, जापान जैसे देशों में बसे भारतीय समुदाय इसे पूरे श्रद्धा, स्नेह और संस्कारों के साथ मनाते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तो व्हाइट हाउस के द्वार दीपावली पर्व के लिए विशेष रूप से जनता हेतु खोल दिए और यह कहा कि — “व्हाइट हाउस जनता का ही है, और दीपावली का यह उत्सव सबके लिए है।” ग्रेट ब्रिटेन में भी यह पर्व भारत की ही भाँति उल्लास, दीपमालाओं और पारंपरिक सज्जा के साथ मनाया जाता है।कार्तिक अमावस्या की रात को जब अनगिनत दीप अपने छोटे-से अस्तित्व से अंधकार को चुनौती देते हैं, तब वह अमावस्या मानो शरद पूर्णिमा में रूपांतरित हो जाती है। यह दीपोत्सव केवल ज्योति का नहीं, आत्मा के आलोक का पर्व है। पौराणिक परंपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात सीता एवं लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटकर रावण पर विजय प्राप्त की थी। उनके स्वागत में सम्पूर्ण अयोध्या नगरी घी के दीपों से आलोकित हो उठी। इस विजयोत्सव के रूप में तब से यह पर्व अनवरत रूप से मनाया जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार, समुद्र-मंथन के समय इसी दिवस पर देवी लक्ष्मी का प्रादुर्भाव हुआ था; अतः इस दिन लक्ष्मी पूजन का अत्यंत शुभ महत्व है।
दीपावली की रात जनमानस प्रतीक रूप में आशा और स्वागत की प्रतीक्षा में द्वार खुले रखते हैं, दीप जलाते हैं — मानो कह रहे हों, “हे सौभाग्य, हे प्रकाश, हमारे घर में पधारो।” व्यापारी समुदाय के लिए यह पर्व नववर्ष का आरंभ भी है। वे इस दिन अपने पुराने बही-खाते समाप्त कर नवीन लेखे आरंभ करते हैं — यह नवता, स्वच्छता और शुभारंभ का प्रतीक है।वर्तमान संदर्भ में दीपावली का महत्व और भी व्यापक हो जाता है। यह दिन आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती के निर्वाण दिवस के रूप में भी स्मरण किया जाता है। इसी प्रकार जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण भी इसी पावन तिथि को हुआ था। अतः आर्य समाज तथा जैन समुदाय के लिए यह दिन श्रद्धा, साधना और प्रकाश का विशेष पर्व है। दीपावली केवल घरों की सजावट का त्यौहार नहीं यह शरीर, मन और आत्मा की स्वच्छता का पर्व है। इस दिन लोग अपने घरों की सफाई के साथ-साथ अंतःकरण के विकारों को भी धोने का प्रयास करते हैं। दीपों की लौ केवल दीवारों को नहीं, अंतरतम के अंधकार को भी आलोकित करती है। इसी उजास से उत्पन्न होती है सच्ची सम्पन्नता भौतिक नहीं, आध्यात्मिक।
बाजारों की रौनक, मिठाइयों की मिठास और स्वर्णाभूषणों की चमक से भी परे, दीपावली का वास्तविक अर्थ है आशा, करुणा और ज्ञान का प्रसार। यही कारण है कि यह पर्व राष्ट्र की आर्थिक चेतना के साथ-साथ सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन चुका है। धनतेरस से दीपावली तक करोड़ों-अरबों का व्यापार होता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था में भी नवोन्मेष का संचार होता है।
दीपावली का गूढ़ संदेश यही है —
“दीप जलाना केवल रोशनी करने का कार्य नहीं,
यह अंधकार से संवाद करने की कला है।”
इसी भाव को साकार करती आपकी पंक्तियाँ —
आओ ज्ञान का दीप जलाएँ अज्ञानता के घनघोर तमस में,
ज्ञान के सहस्त्र दीप जलाएँ, दूर करें अंधियारा जगत से।
निराशा मन-मस्तिष्क से मिटाएँ,
आओ एक ज्ञान का दीप जलाएँ।”
यही है दीपावली का सच्चा स्वरूप — अंधकार से प्रकाश की यात्रा, विकार से विचार की ओर प्रस्थान। आज यह पर्व केवल भारतीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्तर पर मानवता, सद्भाव और उजास का उत्सव बन चुका है।
दीपों की यह उजली भाषा,
मानवता का सच्चा आलोक है।
दीप जलें बाहर भी, भीतर भी।
सभी देशवासियों एवं समस्त विश्व को दीपावली की हार्दिक, मंगलमय एवं आलोकित शुभकामनाएँ।

संजीव ठाकुर
लेखक, चिंतक, स्तंभकार
रायपुर (छत्तीसगढ़),
9009 415 415,
Budaun Amarprabhat