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भारतीय मंदिर ऊर्जा, संतुलन और आत्मोन्नति के केंद्र

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तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के इंडियन नॉलेज सिस्टम- आईकेएस सेंटर की ओर से प्राचीन भारतीय मंदिरों का आध्यात्मिक, दार्शनिक और स्थापत्य महत्त्व पर ऑनलाइन 9वीं राष्ट्रीय कॉन्क्लेव

मुरादाबाद। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रो. राजमल जैन बोले, भारतीय मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं, बल्कि ऊर्जा, संतुलन और आत्मोन्नति के केंद्र हैं। मंदिर समाज के नैतिक और सांस्कृतिक उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह हमेशा मानवता का मार्गदर्शन करते हैं। मंदिरों की पिरामिडीय संरचना और खगोलीय संरेखण को ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ते हुए, उन्होंने आयोनिक और आइकोनिक प्रतिनिधित्व के जरिए मूर्त और अमूर्त स्तर पर आस्था और चेतना के गहरे संबंध की विस्तार से व्याख्या की। प्रो. जैन ने कहा, मंदिर भारतीय मूर्तिकला और चित्रकला आत्मबोध की प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियां हैं, जो शांति परंपरा की प्रतिमाएँ आत्मा और ब्रह्मांड के बीच संबंध को दर्शाती हैं। प्रो. राजमल तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के इंडियन नॉलेज सिस्टम- आईकेएस सेंटर की ओर से प्राचीन भारतीय मंदिरों का आध्यात्मिक, दार्शनिक और स्थापत्य महत्त्व पर ऑनलाइन आयोजित 9वें राष्ट्रीय कॉन्क्लेव में बोल रहे थे। इससे पूर्व कॉन्क्लेव की शुरुआत सरस्वती वंदना के संग हुई। टीएमयू के वीसी प्रो. वीके जैन ने बतौर मुख्य अतिथि कहा, ऐसे कॉन्क्लेव भारतीय ज्ञान परंपरा को सशक्त बनाने और नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने का माध्यम हैं। उन्होंने कहा, भारतीय संस्कृति की जड़ों को समझे बिना आधुनिक भारत का निर्माण अधूरा रहेगा।
लेखक, वक्ता एवम् पुस्तक समीक्षक श्री संदीप सिंह ने मंदिर अर्थशास्त्र पर बोलते हुए कहा, मंदिर आस्था, समाज और संस्कृति की त्रिवेणी हैं। मंदिर समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना हैं और उनका वास्तविक उद्देश्य मानवता, सेवा और आध्यात्मिक उत्थान होना चाहिए, न कि धन या संसाधन प्रबंधन। श्री सिंह ने कहा, आधुनिक शिक्षा में ज्ञान के साथ नैतिकता और अध्यात्म का समावेश जरूरी है। उन्होंने मंदिरों की भूमिका की तुलना रेलवे नेटवर्क से करते हुए बताया, जैसे रेलवे देश को जोड़ता है, वैसे ही मंदिर समाज को आध्यात्मिक रूप से जोड़ने वाला तंत्र हैं। केंद्रीय संस्कृत यूनिवर्सिटी, भोपाल के डॉ. योगेश कुमार जैन ने एलोरा की गुफाएंः भारतीय सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रतीक पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया, एलोरा की 34 गुफाएं बौद्ध, हिंदू और जैन धर्मों की साझा विरासत हैं, जो धार्मिक सहिष्णुता, कलात्मक उत्कृष्टता और स्थापत्य नवाचार का अद्वितीय उदाहरण हैं। उन्होंने कहा, जैन गुफाओं- इंद्र सभा गुफा 32 और जगन्नाथ सभा- गुफा 34 में उकेरी गई मूर्तियां त्याग, तपस्या और मोक्ष मार्ग के प्रतीक हैं। एलोरा की मूर्तियां केवल कलात्मक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक गहराई और प्रतीकात्मकता से पूर्ण हैं।
चिन्मय विश्वविद्यापीठ, एर्नाकुलम के प्रोफेसर डॉ. प्रथीप कुमार आर. ने भारतीय मंदिरः आत्मा, कला और विज्ञान का जीवंत संगम पर बोलते हुए कहा, ये मंदिर धार्मिक, दार्शनिक, कलात्मक और वैज्ञानिक तत्वों का संयोजन हैं, जो मानव को बाह्य जगत से आत्मानुभूति की ओर ले जाते हैं। डॉ. कुमार ने कहा, मंदिर ऊर्जा, वास्तु और दर्शन का अद्वितीय मिश्रण हैं। जैसे- गर्भगृह की यात्रा बाह्य से आंतरिक जगत की प्रतीकात्मक यात्रा है। ऊर्ध्व संरचना भौतिक से दैवीय लोक की ओर आरोहण दर्शाती है। मंदिर वास्तुकला गणित, खगोल, सौंदर्यशास्त्र और दर्शन का संगम है। उन्होंने कहा, भारतीय मंदिर सांस्कृतिक पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जहां संगीत, नृत्य, खगोल, चिकित्सा और शिक्षा का समन्वय होता है। डॉ. कुमार ने मंदिर संरक्षण पर जोर देते हुए कहा, मंदिरों को जीवित शिक्षण केंद्र और चेतना का पुनर्जीवित स्रोत मानना चाहिए। मंदिर मनुष्य, प्रकृति और ईश्वर के बीच सेतु हैं, जहां से आत्मा अंधकार से प्रकाश, सीमितता से अनंत की ओर अग्रसर होती है। कॉन्क्लेव अंत में टीएमयू के आईकेएस सेंटर की समन्वयक डॉ. अलका अग्रवाल ने वोट ऑफ थैंक्स दिया। संचालन फैकल्टी डॉ. माधव शर्मा ने किया।


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