संवाददाता : गोविंद देवल
लखनऊ। राजधानी की तीन अहम विधानसभा सीटें—लखनऊ (पूर्व), लखनऊ (उत्तर) और बख्शी का तालाब—इन दिनों एक अनोखी राजनीतिक हलचल के केंद्र में हैं। वजह है यहां रहने वाली बड़ी संख्या में पूर्वांचल मूल की आबादी, जिनकी हिस्सेदारी 45 प्रतिशत तक मानी जाती है। अब इन मतदाताओं के नाम स्थानीय मतदाता सूची से कटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, और यही बात बीजेपी की नींद उड़ाने लगी है।
दरअसल, बड़ी संख्या में पूर्वांचली परिवार अपने मूल जिलों की पंचायत राजनीति में सक्रिय रहना चाहते हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में हिस्सा लेने के लिए उनके सामने पहला शर्त है—अपने गांव-कस्बे में मतदाता बने रहना। यही कारण है कि वे लखनऊ की मतदाता सूची से विलोप के लिए आवेदन कर रहे हैं। आंकड़ों में यह बदलाव इतना बड़ा हो सकता है कि तीनों विधानसभा क्षेत्रों की चुनावी हवा का रुख बदल दे।
लखनऊ (पूर्व) में बीजेपी की पकड़ अब तक लगभग अजेय मानी जाती रही है। अकबरनगर उजड़ने के बाद यह पकड़ और मजबूत हुई थी। लेकिन अगर यहां पूर्वांचली मतदाताओं का नाम बड़ी संख्या में कटता है, तो समीकरण में ‘यादव’ वोटर की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी—एक ऐसा सामाजिक वर्ग जो भाजपा के लिए परंपरागत रूप से चुनौती रहा है।
लखनऊ (उत्तर) और बीकेटी की स्थिति भी इससे अलग नहीं। दोनों क्षेत्रों में बीजेपी का मजबूत प्रभाव रहा है, पर पूर्वांचल मूल के मतदाताओं के जाने से जातीय संतुलन में बड़ा बदलाव संभव है। बीकेटी में तो स्थिति और रोचक हो सकती है क्योंकि यहां यादव, पासी और गैर-क्षत्रिय ग्रामीण आबादी का अनुपात तेजी से निर्णायक बन सकता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बदलाव ‘SIR’—यानी साइलेंट इलेक्टोरल रिमूवल—की तरह काम करेगा। शोर नहीं, पर असर गहरा। भाजपा के सामने अब चुनौती केवल विपक्ष नहीं, बल्कि बदलते हुए समाजशास्त्रीय समीकरण भी हैं।
आने वाले महीनों में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया इन सीटों का भाग्य लिखेगी और साथ ही राजधानी की राजनीति का नया गणित भी तय करेगी।
Budaun Amarprabhat