संवाददाता: आई एम खान
बिसौली। हाजी बाबा खानकाह में अली डे के अवसर पर एक अदबी व धार्मिक महफ़िल का आयोजन किया गया। महफ़िल में शायरों और नोहाख्वानों ने हजरत अली की शान में मनकबत और कलाम पेश कर समां बांध दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की।
महफ़िल का शुभारंभ हाजी बाबा खानकाह के सज्जादानशीन मो. सलीम खां द्वारा चिराग रोशन कर किया गया। इसके बाद तिलावत-ए-कुरआन से महफ़िल की शुरुआत हुई। कार्यक्रम की निजामत अभीक्ष पाठक आहत ने की।
मशहूर शायर मशहूद खां हमदम बिसौलवी ने हजरत अली की शान में कलाम पेश करते हुए कहा—
“मिदअत अली की, और जुबां इस गुलाम की।
हर गाम जरूरत है, जहां एहतराम की।
उल्फत है मुस्तफा से, अली से गुरेज है।
तौहीन हो रही है, खुदा के कलम की।”
अभीक्ष पाठक आहत ने अपने कलाम में कहा—
“तुम्हारे बिन अभी तक जी रहे हैं।
हलाहल ज़िंदगी का पी रहे हैं।”
मशकूर नज़मी ने अली डे को नए साल से जोड़ते हुए कहा—
“इब्तिदा जनवरी की यूं अच्छी लगी,
ये रजब पड़ गई है नये साल में।
मदहे मौला इबादत है मौलाई की,
जश्ने मौला अली है नये साल में।”
डा. अमीरउद्दीन अमीर ने सामाजिक संदेश देते हुए कहा—
“जी हुज़ूरी से मिलती हैं अब पगड़ियां,
हक़ बयानी को मुंह खोलता कौन है।”
अंत में महफ़िल के आयोजक राजा फिरोज ने सभी आए हुए मेहमानों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। महफ़िल में माजिद सलमानी, सूफी जरीफ अश्क, फहीम बिसौलवी, आलम बेग, हमजा बिसौलवी, फरीद इदरीसी और श्रीदत्त मुजतर ने भी अपने-अपने कलाम पेश किए।
इस अवसर पर मन्नू, अहकम खान, रम्मू खान, मूसा, दानिश, ओसाफ खान सहित अनेक लोग मौजूद रहे।
Budaun Amarprabhat