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भोग नहीं योग में मन लगाएं, तभी मिलेगा परम आनंद : पं. हर्षित उपाध्याय

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संवाददाता: डा. राशिद अली खान, सहसवान (बदायूं)
सहसवान नगर के नयागंज स्थित अग्रवाल धर्मशाला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कथा व्यास पंडित हर्षित उपाध्याय ने श्रद्धालुओं को जीवन का सार समझाते हुए कहा कि मानव मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि जहां उसे सुख दिखाई देता है, वह स्वतः उसी ओर आकर्षित हो जाता है। मनुष्य भोग के स्वाद से परिचित है, इसलिए वह भोगों में ही रमा रहता है, लेकिन जिस दिन उसका मन योग के अलौकिक आनंद को समझ लेगा, उस दिन वह भोगों के तुच्छ सुख को छोड़कर योग के परम आनंद की साधना में लग जाएगा।
कथा व्यास ने कहा कि मन को योगी बनाए बिना जीवन को निरोगी नहीं बनाया जा सकता। मन आलस्य और प्रमाद में सुख खोजता है, इसलिए व्यक्ति आलसी बना रहता है। लेकिन जिस दिन मन परिश्रम के सुख का स्वाद चख लेता है, उसी दिन वह स्वयं परिश्रम के लिए प्रेरित करने लगता है।
उन्होंने कहा कि आलस्य वर्तमान में सुख का अनुभव करा सकता है, लेकिन भविष्य को दुःखमय बना देता है, जबकि परिश्रम वर्तमान में कष्टदायक लग सकता है, परंतु भविष्य को आनंदमय बनाता है। इसलिए प्रयास होना चाहिए कि मन भोग में नहीं, योग में लगे, आलस्य में नहीं, परिश्रम में लगे और नश्वर सुख के साथ-साथ शाश्वत सुख को भी प्राप्त करे।
कथा के दौरान मुख्य यजमान संतोष गांधी उर्फ कल्लू सेठ, पुष्पा गांधी, प्रियांक चांडक, कोमल चांडक, शिव कुमार, अशोक कुमार, मुकुल, ध्रुव, अंश गांधी, मनीष सर्राफ, महेंद्र शर्मा सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।


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