दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर, अधिवक्ता ने सरकार से न्याय की मांग उठाई
लखनऊ। देश की रक्षा करते हुए सीमा पर शहीद हुए वीर सैनिक अजमेर अली की पत्नी अबरीशा खातून को अब तक लिबरलाइज्ड पारिवारिक पेंशन नहीं मिल पाई है। इसको लेकर वह लंबे समय से दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने इस मामले में सरकार और संबंधित अधिकारियों से न्याय दिलाने की मांग उठाई है।
अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने बताया कि 22 मार्च 1987 को लद्दाख क्षेत्र के खारदुंगला पास पर लेह–चलुंका रोड पर तैनात बंगाल इंजीनियर ग्रुप के जांबाज सैनिक अजमेर अली देश की सेवा में ड्यूटी कर रहे थे। यह स्थान समुद्र तल से करीब 18 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है, जहां अत्यधिक ठंड और ऑक्सीजन की कमी के कारण सामान्य स्थिति में भी सांस लेना कठिन होता है।
बताया गया कि अचानक मौसम खराब होने से भारी बर्फबारी शुरू हो गई और लेह–चलुंका रोड पूरी तरह बंद हो गया, जिससे सेना की आवाजाही और रसद आपूर्ति प्रभावित हो गई। ऐसे में शहीद अजमेर अली ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद बर्फ हटाकर संपर्क मार्ग खोलने का कार्य शुरू किया, ताकि सेना का संपर्क देश के अन्य हिस्सों से बना रहे।
इसी दौरान अचानक भारी हिमस्खलन हो गया और वह बर्फ के नीचे दब गए। ड्यूटी के दौरान ही उन्होंने वीरगति प्राप्त की। उनकी बहादुरी और कर्तव्यनिष्ठा को देखते हुए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकेटरमण ने वर्ष 1989 में उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया था, जो देश का दूसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है।
इसके बावजूद अब तक उनकी शहादत को “बैटल कैजुअल्टी (फेटल)” घोषित नहीं किया गया और उनकी पत्नी को उदारीकृत पारिवारिक पेंशन भी नहीं मिल सकी है। शहीद की पत्नी अबरीशा खातून का कहना है कि यह केवल उनके परिवार का ही नहीं बल्कि उन सभी सैनिक परिवारों के सम्मान का मामला है, जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया है। उन्होंने कहा कि यदि न्याय नहीं मिला तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होंगी।
अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय ने सरकार से मांग की है कि शहीद अजमेर अली की मृत्यु को बैटल कैजुअल्टी घोषित करते हुए उनकी पत्नी को तत्काल प्रभाव से लिबरलाइज्ड पारिवारिक पेंशन और सभी बकाया देयकों का भुगतान किया जाए।
Budaun Amarprabhat