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“निष्क्रिय इच्छामृत्यु”

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तेरह साल की मां की तपस्या
आज अंत की घड़ी आई है,
यह कैसी दुआ है परमात्मा
हर आंख अश्रु से भर आई है।

न्यायालय में जाकर जब
मां ने गुहार लगाई होगी ,
दिल कितने टुकड़ों में टूटा होगा
अपने ही फैसले पर सकुचाई होगी।

आखिर मंजूरी मिल ही गई
गौरव, सम्मानपूर्ण विदाई की,
फैसले पर कलम चलाते ही
आंख भर आई जज साहिब की।

ममता की छांव, पिता का समर्पण
जब नहीं बदल सका किस्मत लाल की,
लेना ही पड़ा कठिन और कठोर फैसला
क्या बताएं वह मां टूटन अपने हाल की?

एक एक जीवनदायिनी यंत्र
जब जिंदा लाश से अलग किया जाएगा ,
अब तक महसूस करती थी जो सांसे
अब मृत शरीर से रूबरू किया जाएगा।

धन्य वो माँ जो ले पाई निष्ठुर फैसला
धन्य वो पिता भी जिसने बनाए रखा हौसला,
कभी-कभी वक्त के हाथों लाचार सभी होते हैं
बेबस है समय के हाथों, नैन अश्रुओ से धोते हैं।

विदाई के वक्त मां की आंखों में यादों का बसेरा होगा,
सूर्य भी उदित होगा, पक्षियों का करलव होगा,
पर मां के जीवन में अब कभी ना सवेरा होगा।

प्रीति अरोरा( लेखिका )
बदायूं, उत्तर प्रदेश


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