संवाददाता: गोविंद देवल, वाराणसी
वाराणसी। आधुनिकता की अंधी दौड़ और बढ़ते प्रदूषण के बीच कभी घर-आंगन की रौनक रही गौरैया अब तेजी से विलुप्त होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल टॉवरों से निकलने वाला रेडिएशन, पक्के मकान, छतों पर लगने वाले जाल और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग इस नन्हीं चिड़िया के अस्तित्व पर संकट बन चुका है।
पर्यावरणविदों के अनुसार, गौरैया केवल एक पक्षी नहीं बल्कि पारिस्थितिक संतुलन की अहम कड़ी है। यह कीड़े-मकोड़ों को नियंत्रित कर पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन शहरीकरण के चलते इनके घोंसले बनाने के स्थान खत्म हो गए हैं, जिससे इनकी संख्या लगातार घट रही है।
विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि समय रहते संरक्षण के उपाय नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां गौरैया को केवल किताबों में ही देख पाएंगी।
क्या करें हम?
गर्मियों की शुरुआत के साथ ही लोगों से अपील की गई है कि वे अपने घरों की छतों और आंगन में दाना-पानी रखें। पेड़-पौधों पर कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग करें और घर में बचा हुआ अनाज व भोजन खुले स्थान पर रखें, ताकि पक्षियों को आहार मिल सके।
भूल चुकी पुरानी परंपराओं को फिर से अपनाने की जरूरत है। छोटे-छोटे प्रयासों से ही हम इस नन्हीं मेहमान को फिर से अपने घर-आंगन में वापस ला सकते हैं और पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।
Budaun Amarprabhat