Breaking News

आध्यात्मिक ऊर्जा के संचार का महोत्सव दशलक्षण

Spread the love

दशलक्षण महापर्व पर विशेष

प्रो. रवि जैन/डॉ. अर्चना जैन
पर्युषण शब्द संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ है आत्मा के समीप वास करना अथवा कर्मों का क्षय करना। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। दिगंबर परंपरा में इसे दशलक्षण पर्व के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस दौरान दस उत्तम धर्मों- दशलक्षण पर विशेष चिंतन किया जाता है। भारत के प्रमुख जैन तीर्थ स्थलों और देशभर के जैन मंदिरों में इन दिनों आध्यात्मिक ऊर्जा का विशेष संचार देखने को मिल रहा है। यह दस दिवसीय महापर्व आत्मशुद्धि, तपस्या और आध्यात्मिक जागृति का अनूठा अवसर है। जैन आचार्यों के अनुसार, यह पर्व केवल उपवास या बाह्य अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंतरिक परिवर्तन और आत्म-निरीक्षण का समय है। दशलक्षण पर्व के दस धर्म- उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य मानव जीवन को नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ बनाने की दिशा दिखाते हैं। प्रत्येक धर्म मनुष्य के भीतर उपस्थित किसी न किसी विकार को दूर करने का संदेश देता है। क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, कपट के स्थान पर सरलता, लोभ के स्थान पर संतोष और असंयम के स्थान पर आत्मनियंत्रण अपनाने का संदेश इस पर्व की मूल भावना है।

पर्युषण पर्व के दौरान जैन श्रद्धालु अपनी क्षमता और संकल्प के अनुसार एकासन, उपवास, बेला और अन्य प्रकार की तप साधना करते हैं। अनेक श्रद्धालु दस दिनों तक निराहार रहकर भी तपस्या करते हैं। मंदिरों में प्रतिदिन धार्मिक प्रवचन, स्वाध्याय, पूजा, ध्यान और प्रार्थना का आयोजन होता है। इन धार्मिक गतिविधियों का उद्देश्य केवल धार्मिक विधियों का पालन करना नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मसंयम की भावना को मजबूत करना है। इस अवसर पर जीवदया और समाजसेवा की भावना भी विशेष रूप से दिखाई देती है। पशु-पक्षियों के लिए भोजन एवम् जल की व्यवस्था, जरूरतमंदों को भोजन वितरण, जीवों की रक्षा, रक्तदान, नेत्र परीक्षण और निःशुल्क चिकित्सा शिविर जैसे सेवा कार्य भी अनेक संस्थाओं की ओर से किए जाते हैं। इस प्रकार पर्युषण पर्व आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ सामाजिक संवेदनशीलता और मानव कल्याण का संदेश भी देता है। आज का मनुष्य तेज जीवनशैली, निरंतर प्रतिस्पर्धा, मानसिक दबाव, पारिवारिक तनाव और भौतिक इच्छाओं के बढ़ते बोझ से घिरा हुआ है। ऐसे समय में दशलक्षण धर्म के सिद्धांत केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि संतुलित जीवन के व्यावहारिक मार्गदर्शक भी बन सकते हैं। क्षमा मन को हल्का करती है, विनम्रता संबंधों को मधुर बनाती है, सत्य विश्वास को मजबूत करता है और संयम व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सिखाता है।

यदि इन दस धर्मों को केवल दस दिनों तक सीमित न रखकर दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए तो समाज में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव है। क्षमा से हिंसा और संघर्ष में कमी, मार्दव से अहंकार और भेदभाव में कमी, आर्जव से छल-कपट में कमी, सत्य से अविश्वास और सामाजिक भ्रम में कमी लाई जा सकती है। संयम व्यक्ति को नशे, अनियंत्रित उपभोग और अनुचित व्यवहार से बचाने में सहायक हो सकता है। तप शरीर और मन में अनुशासन विकसित करता है। त्याग सामाजिक सहयोग और सेवा की भावना को मजबूत करता है। आकिंचन्य अनावश्यक उपभोग को कम करके पर्यावरण संरक्षण का मार्ग प्रशस्त करता है, जबकि ब्रह्मचर्य पारिवारिक एवम् सामाजिक जीवन में अनुशासन और स्थिरता की भावना को बढ़ावा देता है। इस प्रकार दशलक्षण धर्म का प्रभाव केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक शांति, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक संतुलन, पर्यावरण संरक्षण, नैतिकता और पारस्परिक विश्वास को बढ़ावा देने वाला जीवन-दर्शन प्रस्तुत करता है।

आज जब दुनिया हिंसा, युद्ध, तनाव, असहिष्णुता, उपभोक्तावाद और पर्यावरणीय संकट जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, तब दशलक्षण धर्म का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। क्षमा मनुष्य को प्रतिशोध से बचाती है, विनम्रता अहंकार को नियंत्रित करती है, सरलता विश्वास बढ़ाती है, संतोष लालच को सीमित करता है, सत्य मानसिक शांति देता है, संयम आत्मनियंत्रण सिखाता है, तप अनुशासन विकसित करता है, त्याग सेवा की प्रेरणा देता है, आकिंचन्य भौतिक आसक्ति को कम करता है और ब्रह्मचर्य जीवन में अनुशासन एवम् एकाग्रता का विकास करता है।

उत्तम क्षमाः मानसिक शांति का आधार
उत्तम क्षमा का अर्थ केवल दूसरों को क्षमा करना नहीं, बल्कि अपने मन से क्रोध, द्वेष और प्रतिशोध की भावना को दूर करना भी है। मनोविज्ञान संबंधी अध्ययनों में यह पाया गया है कि क्षमा की भावना मानसिक तनाव और क्रोध को कम करने में सहायक हो सकती है। लगातार क्रोध और तनाव शरीर में तनाव से संबंधित हार्माेन, विशेषकर कॉर्टिसोल, के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। क्षमा की भावना व्यक्ति को मानसिक शांति, सहनशीलता और सकारात्मक भावनाओं की ओर ले जाती है। यदि व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर मन में द्वेष बनाए रखता है तो उसका मानसिक बोझ बढ़ता जाता है। इसके विपरीत क्षमा का अभ्यास मन को तनावमुक्त करने और सामाजिक संबंधों में सौहार्द बढ़ाने में सहायक हो सकता है।

उत्तम मार्दवः अहंकार के स्थान पर विनम्रता
मार्दव अर्थात विनम्रता मनुष्य को अहंकार से दूर रखती है। विनम्र व्यक्ति दूसरों की बात सुनने, सहयोग करने और अपनी गलतियों को स्वीकार करने में अधिक सहज होता है। आधुनिक मनोविज्ञान में सामाजिक संबंधों और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को मानसिक स्वास्थ्य एवम् प्रभावी सहयोग से जोड़ा जाता है। विनम्रता व्यक्ति की दूसरों को समझने और उनके साथ मिलकर कार्य करने की क्षमता को मजबूत कर सकती है।

उत्तम आर्जवः सरलता और विश्वास
आर्जव का अर्थ है मन, वचन और कर्म में सरलता और कपट से रहित व्यवहार। जब व्यक्ति के विचार और व्यवहार में एकरूपता होती है तो उसके भीतर मानसिक द्वंद्व कम होता है। सरल और स्पष्ट व्यवहार पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक संबंधों में विश्वास को मजबूत करता है।

उत्तम शौचः लोभ से मुक्ति और संतोष
शौच का संबंध आंतरिक पवित्रता और लोभ से मुक्ति से है। आधुनिक जीवन में आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह व्यक्ति पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ा सकता है। संतोष की भावना व्यक्ति को अनावश्यक इच्छाओं से बचाकर मानसिक स्थिरता प्रदान कर सकती है।

उत्तम सत्यः मानसिक स्पष्टता और विश्वास
सत्य बोलना व्यक्ति के विचारों और व्यवहार में एकरूपता बनाए रखता है। झूठ बोलने की स्थिति में व्यक्ति को अनेक बातों को याद रखना और छिपाना पड़ता है, जिससे मानसिक तनाव बढ़ सकता है। सत्यनिष्ठ जीवन मानसिक शांति, पारस्परिक विश्वास और सामाजिक विश्वसनीयता को बढ़ावा देता है।

उत्तम संयमः आत्मनियंत्रण की शक्ति
संयम दशलक्षण धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। यह व्यक्ति को अपनी इच्छाओं, भावनाओं और व्यवहार पर नियंत्रण रखना सिखाता है। आधुनिक मनोविज्ञान में आत्मनियंत्रण और इच्छाओं को विलंबित करने की क्षमता को निर्णय लेने और लक्ष्य प्राप्त करने की महत्वपूर्ण योग्यता माना जाता है। संयम व्यक्ति को तत्काल आकर्षण के बजाय दीर्घकालीन हित को प्राथमिकता देना सिखाता है।

उत्तम तपः शरीर और मन के अनुशासन का अभ्यास
तप का अर्थ केवल उपवास करना नहीं है। यह आत्मसंयम, अनुशासन, ध्यान और इंद्रियनिग्रह की व्यापक साधना है। वैज्ञानिक अध्ययनों में नियंत्रित उपवास और भोजन की मात्रा में संतुलन को शरीर की कुछ जैविक प्रक्रियाओं से जोड़ा गया है। उपवास के दौरान शरीर में ऊर्जा उपयोग से संबंधित परिवर्तन होते हैं और कोशिकीय स्तर पर स्वभक्षण जैसी प्रक्रियाएं सक्रिय हो सकती हैं, जिनका संबंध कोशिकीय पुनर्चक्रण से है। ध्यान और साधना तनाव कम करने और शरीर की विश्राम संबंधी प्रक्रियाओं को सक्रिय करने में भी सहायक हो सकती है।

उत्तम त्यागः प्रसन्नता और सामाजिक सहयोग
त्याग व्यक्ति को केवल अपने लिए जीने के बजाए दूसरों के हित के लिए योगदान करने की प्रेरणा देता है। दान, सेवा और परोपकार से व्यक्ति में संतोष और प्रसन्नता की भावना उत्पन्न हो सकती है। सामाजिक मनोविज्ञान में परोपकारी व्यवहार को पारस्परिक विश्वास, सहयोग और सामाजिक जुड़ाव से जोड़ा गया है।

उत्तम आकिंचन्यः कम संग्रह, अधिक संतोष
आकिंचन्य का संदेश है कि अनावश्यक वस्तुओं और भौतिक संपत्ति के प्रति अत्यधिक आसक्ति से बचा जाए। आज विश्व में बढ़ती उपभोक्तावादी प्रवृत्ति प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव और पर्यावरणीय समस्याओं को बढ़ा रही है। सीमित आवश्यकताओं के साथ जीवन जीने की प्रवृत्ति मानसिक बोझ को कम करने के साथ-साथ संसाधनों के संरक्षण में भी सहायक हो सकती है।

उत्तम ब्रह्मचर्यः अनुशासन और एकाग्रता
ब्रह्मचर्य का व्यापक अर्थ इंद्रियों पर नियंत्रण, विचारों की पवित्रता और अनुशासित जीवन से है। व्यक्ति जब अपनी ऊर्जा और समय को अनावश्यक आकर्षणों से बचाकर सकारात्मक कार्यों में लगाता है तो उसकी एकाग्रता और आत्मनियंत्रण मजबूत हो सकते हैं।

पर्युषण पर्व इसलिए केवल जैन समाज का धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता को आत्मचिंतन, क्षमा, संयम, सत्य, त्याग और संतोष का संदेश देने वाला अवसर है। यदि मनुष्य अपने जीवन में इन दस मूल्यों को व्यवहार में उतार सके तो व्यक्तिगत तनाव कम करने से लेकर पारिवारिक सौहार्द, सामाजिक सद्भाव और पर्यावरण संरक्षण तक अनेक क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। दशलक्षण धर्म का वास्तविक उद्देश्य बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, मान, माया, लोभ और आसक्ति को पहचानकर उन्हें कम करने का सतत प्रयास है। यही आत्मशुद्धि की दिशा है और यही अंततः समाज और विश्व में शांति की आधारशिला बन सकती है। पर्युषण पर्व का संदेश स्पष्ट हैः अपने भीतर परिवर्तन लाएं, दूसरों को क्षमा करें, सत्य और संयम को अपनाएं, आवश्यकता से अधिक संग्रह से बचें और अपने जीवन को सेवा, करुणा और आत्मअनुशासन से समृद्ध बनाएं। और यही आधुनिक समाज के लिए इसका सार्वभौमिक संदेश भी है।

(लेखक नामचीन तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद-यूपी के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एवम् कॉलेज ऑफ एलाइड हेल्थ साइंसेज में सीनियर फैकल्टी हैं।)


Spread the love

About Budaun Amarprabhat

Check Also

मंगलमूर्ति की स्थापना कर विधि-विधान से हुआ पूजन, मातृशक्तियों ने गाए मंगलगीत

Spread the loveउझानी : भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी पर मुहल्ला नझियाई में …