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काव्यदीप संस्थान की पंचम काव्यगोष्ठी में गूंजे अहसासों के स्वर, कलमकारों का हुआ सम्मान

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स्व. वीरेंद्र कुमार सक्सेना की जयंती पर सजी महफिल, देश-दुनिया के बदलते रिश्तों पर कवियों ने किया कटाक्ष
बदायूँ। स्टेशन मार्ग स्थित देव कैफे के सभागार में रविवार को काव्यदीप हिंदी साहित्यिक संस्थान द्वारा एक भव्य पंचम काव्यगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। संस्थान के प्रणेता स्व. वीरेंद्र कुमार सक्सेना की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित इस साहित्यिक महाकुंभ में जनपद व आसपास के क्षेत्रों से आए विख्यात रचनाकारों ने अपनी मर्मस्पर्शी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर समाज और साहित्य में उत्कृष्ट योगदान देने वाले कलमकारों को सम्मानित भी किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मशहूर शायर उस्ताद अहमद अमजदी ने की, जबकि कुशल मंच संचालन सुप्रसिद्ध कवि राजवीर सिंह ‘तरंग’ ने किया। गोष्ठी का विधि-विधान से शुभारंभ कवयित्री दीप्ति सक्सेना ‘दीप’ द्वारा प्रस्तुत मधुर सरस्वती वंदना से हुआ।
गोष्ठी के अध्यक्ष और प्रख्यात शायर अहमद अमजदी ‘बदायूँनी’ ने मुहब्बत और जिंदगी के फलसफे को बयां करते हुए पढ़ा:
‘ज़माना तंग करेगा तुम्हें मुहब्बत में, अगर है प्यार किसी से तो फिर नज़र से कहो।
सलामती से पहुंचना हो तुम को मंज़िल पर, तो अपनी बात कभी भी न हमसफ़र से कहो।।’
इसके बाद वरिष्ठ छंदकार कामेश पाठक ने एक बेटी की मार्मिक कहानी को अपने छंदों में पिरोकर हॉल में मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। उन्होंने पढ़ा:
‘ईश्वर का अनमोल खजाना दुनिया का उपहार है।
बेटी घर की तुलसी है, बेटी घर का श्रृंगार है।’
बिल्सी से पधारे ओज के प्रसिद्ध कवि जौहरी ने इंसानी फितरत और समाज के दोगलेपन पर तीखा प्रहार करते हुए पढ़ा:
‘डर नहीं लगता है मुझ को तीर से तलवार से, डर रहा हूँ आदमी के दोगले व्यवहार से।
बाँट कर खुशियाँ जगत को हक़ अदा करता रहा, हो मुनाफ़ा या कि घाटा मुझ को मतलब प्यार से।।’
युवा कवि अमन मयंक शर्मा ने पिता की यादों को समर्पित एक बेहद भावुक कर देने वाली हिंदी गज़ल प्रस्तुत की, जिसने सभी को भाव-विभोर कर दिया:
‘भूल सकता नहीं मांझी की कहानी पापा, याद आती है हर इक बात पुरानी पापा।
जब भी होता है कभी दिल जो परिशां मेरा, देख लेता हूं मैं तस्वीर तुम्हारी पापा।’
मशहूर ग़ज़लकार शैलेन्द्र मिश्र ‘देव’ ने इंसानियत और दिखावे की संस्कृति पर चोट करते हुए पढ़ा:
‘शख्स वो ही महान बनता है, सिर्फ़ अपना जो ध्यान रखता है।
धर्म सेवा मगर दिखावे को, काम करने का नाम करता है।’
मंच संचालक और सुप्रसिद्ध कवि-शायर राजवीर सिंह ‘तरंग’ ने इश्क के अहसासों को नए रंग में पेश करते हुए खूब वाहवाही लूटी:
‘पहले दिल से जरा मशवरा कीजिए, फिर शुरू प्यार का सिलसिला कीजिए।
आपके मयकदे की पियेंगे शराब, अपनी आंखों को तुम मयकदा कीजिए।’
गोष्ठी की संयोजिका कवयित्री दीप्ति सक्सेना ‘दीप’ ने ईश्वर वंदना के माध्यम से आध्यात्मिक रस घोला:
‘अँखियाँ हरि दर्शन अभिलाषी, दुनिया आकर्षण आभासी।
नीर–क्षीर से प्यास मिटे न, रसना चरणामृत की प्यासी।।’
वहीं, नामचीन कवयित्री पल्लवी शर्मा ने स्व. वीरेंद्र कुमार सक्सेना जी के प्रेरक जीवन वृत्त को रेखांकित करते हुए काव्यमयी श्रद्धांजलि अर्पित की:
‘संघर्षों से पा कर के विजय, शक्ति अकूत बन गए।
वीरेंद्र कुमार सक्सेना जी, देवदूत बन गए।।’
कार्यक्रम में सुनील शर्मा ‘समर्थ’, अचिन मासूम, मंजू सक्सेना, गौरव सक्सेना, अनिका शाक्य, और आलोक शाक्य आदि साहित्यकारों ने भी स्व. वीरेंद्र सक्सेना के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनका भावपूर्ण स्मरण किया और अपनी लघु रचनाएं प्रस्तुत कीं। अंत में सभी आगंतुक अतिथियों का आभार व्यक्त किया गया।


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