रावण वाले काम और मुंह में राम यह पूजा नहीं होती: आचार्य रूप
बिल्सी। तहसील क्षेत्र के गांव गुधनी में स्थित प्रज्ञा यज्ञ मंदिर में आर्य समाज की ओर से साप्ताहिक सत्संग आयोजित किया गया। आज का यज्ञ नवरात्र को समर्पित था। अंतर्राष्ट्रीय वैदिक विद्वान आचार्य संजीव रूप ने पूजा के सही रूप की व्याख्या करते हुए कहा कि पूजा नाम सत्कार का है आवश्यकता की पूर्ति का है। देवताओं की ना तो कोई आवश्यकता है और ना ही उन्हें सत्कार की आवश्यकता है। देवता तो उसका नाम है जो देता ही देता है। हम बस उनसे अच्छे प्रकार ले लें , यही पूजा है। देवता दो प्रकार के होते हैं एक जड़ देवता दूसरे चेतन देवता। माता पिता, गुरु आदि चेतन देव है। जड़ देवता वह होते है जिनमें आत्मा नहीं होती। जैसे अग्नि, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र आदि। हम इन्हें कुछ नहीं दे सकते। वृक्ष फल रहे हैं नदियां बह रही हैं हम इनका क्या सत्कार करेंगे बस इन्हें गंदा न होने दे समय पर वृक्ष में पानी दे और फलों का सेवन करें। ऐसे ही देवी देवता जो मंदिर में मूर्ति रूप में विराजे हैं वे अपने आप में वेद मंत्र है और हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं। यदि हमने भगवान राम की मूर्ति के सामने खड़े होकर मर्यादित जीवन नहीं सीखा तो फिर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की पूजा नहीं की। रावण वाले काम और मुंह में राम यह पूजा नहीं होती। देवताओं की पूजा का सर्वोत्तम उपाय यज्ञ हवन है। क्योंकि अग्नि में डाला जाता है वह सारे वायुमंडल में जल करके फैल जाता है। मास्टर अगरपाल सिंह ने कहा कि व्रत नाम संकल्प का है। जैसे हम संकल्प लेते हैं कि हम रोज सुबह जल्दी उठेंगे शाकाहारी रहेंगे, माता-पिता की रोज सेवा करेंगे यह व्रत कहलाते हैं। भूखे रहने का नाम व्रत नहीं है। मोना आर्य, इशा आर्य ने सुंदर भजन सुनाए। इस मौके पर तृप्ति शास्त्री, कौषकी रानी, सूरजवती देवी, सरोज देवी, गुड्डू देवी, राकेश आर्य, सत्यम आर्य एवं संस्कारशाला के बच्चे मौजूद रहे।
Budaun Amarprabhat