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दीपावली पवित्र उजाले का महोत्सव,धनतेरस उसका प्रथम द्वार

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“धनं धर्मेण गम्यते” धन धर्म से प्राप्त हो और धर्म के लिए ही प्रयुक्त हो।
यही सनातन सूत्र दीपावली और धनतेरस के मूल में विद्यमान है।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में प्रत्येक पर्व केवल उत्सव नहीं होता, वह मनुष्य, ईश्वर, समाज और आत्मा के बीच एक पवित्र संवाद होता है। दीपावली और धनतेरस भी ऐसे ही दिव्य संवाद की प्रेरणा हैं, जो हमें स्मरण कराते हैं कि प्रकाश केवल बाहर नहीं, भीतर भी जलना चाहिए। यह पर्व मानव-चेतना, श्रम, विश्वास और अध्यात्म का अद्भुत संगम है।
 धनतेरस दीपावली का प्रथम द्वार है। यह कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की संध्या को आता है जब आकाश में चाँद छोटा होता है, पर धरती पर दीपक बड़ी आशा से जलते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृतकलश सहित प्रकट हुए थे — जिन्होंने मानवता को स्वास्थ्य और आरोग्य का अमूल्य वरदान दिया।
अतः यह दिन केवल “धन” का नहीं, बल्कि “धन्य” होने का प्रतीक है।
सच्चा धन वही है जो शरीर और समाज दोनों को स्वस्थ रखे।
इसी दिन से माँ लक्ष्मी के आवाहन का आरंभ होता है।
लोग सोना, चाँदी, बर्तन या नए साधन खरीदते हैं — यह केवल भौतिक लेन-देन नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संकल्प होता है कि समृद्धि सदाचार और श्रम के मार्ग से अर्जित हो।
धनतेरस का संदेश स्पष्ट है —
धन का उपयोग धर्म के लिए हो, धर्म का उपयोग धन के लिए नहीं।”
यही सनातन संतुलन जीवन का आधार है।फिर आता है दीपों का पर्व — दीपावली, जब अमावस्या की रात पूर्ण अंधकार में लिपटी होती है और एक छोटा-सा दीप मिट्टी की लौ में ब्रह्म का प्रतीक बन जाता है।
यह दीप कहता है —
“अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक लौ पर्याप्त है उसे मिटाने के लिए।”
पौराणिक दृष्टि से यह दिन भगवान श्रीराम की अयोध्या-वापसी का स्मरण है  चौदह वर्ष के वनवास और रावण-वध के पश्चात जब श्रीराम अयोध्या लौटे, तो नगर लाखों दीपों से आलोकित हो उठा।यह केवल श्रीराम के आगमन का नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और न्याय की विजय का उत्सव था।
इस दिन समुद्र मंथन से प्रकट माँ लक्ष्मी का पूजन भी होता है।
वे बताती हैं कि जहाँ श्रम, सत्य और पवित्रता है वहीं स्थायी समृद्धि का वास होता है।
धार्मिक दृष्टि से दीपावली अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की यात्रा है।
उपनिषदों का यह सूत्र “तमसो मा ज्योतिर्गमय” इस पर्व की आत्मा है।
पर यह केवल वैदिक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शन है।
जब मनुष्य अपने भीतर के तमस लोभ, क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या को दूर करता है, तब उसका जीवन वास्तव में प्रकाशित होता है।
सामाजिक दृष्टि से दीपावली सह-अस्तित्व और साझी प्रसन्नता का प्रतीक है। प्रकाश तभी फैलता है जब प्रत्येक घर का दीप समान रूप से जले।
दीपावली का दीप सामूहिकता और समता का प्रतीक है,
छोटे घर का दीप भी उसी आकाश में चमकता है, जिसमें महलों का दीप।
यह पर्व सिखाता है कि समाज का उजाला किसी एक दीप से नहीं, सभी दीपों के मिलन से बनता है।धनतेरस और दीपावली दोनों ही स्वच्छता और संयम के पर्व हैं। घर की सफाई केवल धूल हटाने की क्रिया नहीं, बल्कि मन के कलुष को दूर करने का प्रतीक है।
इस काल में लोग घर, वस्त्र और मन — तीनों को पवित्र करते हैं, क्योंकि माना गया है कि लक्ष्मी वहीं आती हैं जहाँ शुद्धता, श्रम और प्रसन्नता हो। व्यापारी वर्ग इस दिन बहीखातों की पूजा करता है।
यह भावना प्रकट करती है कि धन-लाभ केवल व्यापार का उद्देश्य नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण का साधन भी होना चाहिए।समाज का संतुलन तभी संभव है जब धन का प्रवाह धर्म से नियंत्रित हो और धर्म विवेक से प्रेरित।
दीपावली का प्रकाश केवल लौ नहीं, एक संदेश है —
आत्मा के जागरण का, मनुष्य की श्रेष्ठता का, और अंधकार पर उसकी विजय का।
धनतेरस हमें आरोग्य देता है, दीपावली हमें आलोक देती है —
और दोनों मिलकर सिखाते हैं कि समृद्धि तभी पूर्ण है जब वह शांति, स्वास्थ्य और संतुलन से जुड़ी सनातन धर्म की विशेषता यही है कि वह जीवन के प्रत्येक पक्ष को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की चारधारा से जोड़ता है।
धनतेरस “अर्थ” का सत्व है, दीपावली “मोक्ष” की दिशा।दोनों मिलकर हमें बताते हैं कि जीवन की पूर्णता बाहरी संपन्नता से नहीं, आंतरिक पवित्रता से आती है।
दीपावली का अर्थ केवल घर में दीप जलाना नहीं —
बल्कि मन में विनम्रता, कर्म में सजगता, और व्यवहार में सत्यता का दीप जलाना है।
जब समाज का हर दीप अपने भीतर प्रकाश पाता है, तभी राष्ट्र सच में आलोकित होता है।
और यही इस पर्व का सनातन संदेश है
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
जो धर्म की रक्षा करता है, वही सच्चे अर्थों में सुरक्षित रहता है।
धनतेरस और दीपावली ये दो पर्व केवल पूजा और उत्सव नहीं,
बल्कि जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों का संतुलन हैं।
एक हमें आरोग्य और समृद्धि की राह दिखाता है, दूसरा हमें सिखाता है कि समृद्धि तभी स्थायी है जब वह धर्म की लौ से प्रज्ज्वलित हो। जब मनुष्य अपने भीतर के दीप को पहचान लेता है,तब संसार का कोई अंधकार उसे छू नहीं सकता।यही सनातन दर्शन का गूढ़ संदेश है —
“अंधकार चाहे बाहर हो या भीतर, दीपक का जन्म सदैव उसे मिटाने के लिए ही होता है।”
संजीव ठाकुर
लेखक, चिंतक एवं स्तंभकार
रायपुर (छत्तीसगढ़)9009415415,

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