मेरठ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में जलशक्ति राज्य मंत्री और हस्तिनापुर से दो बार के विधायक दिनेश खटीक ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में बड़ा बयान देकर राजनीतिक हलचल मचा दी है। उन्होंने हस्तिनापुर विधानसभा सीट को ‘श्रापित भूमि’ बताते हुए कहा कि वे अब यहां से तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ना चाहते।
यह बयान मेरठ के खरखौदा क्षेत्र में एक निजी कार्यक्रम के दौरान दिया गया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।कार्यक्रम में कल्कि धाम पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम की मौजूदगी में मंत्री खटीक ने मंच से अपनी मन की बात साझा की। उन्होंने महाभारत काल का जिक्र करते हुए कहा कि हस्तिनापुर की धरती पर द्रौपदी का श्राप है और धार्मिक ग्रंथों व पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है। खटीक ने बताया, “मैंने भागवत और महापुराण पढ़े हैं। हस्तिनापुर का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व है, लेकिन यह श्रापित भूमि मानी जाती है। मेरे मन में बार-बार यह बात आती है कि मैं यहां से फिर विधायक नहीं बनना चाहता।
“दिनेश खटीक ने स्पष्ट किया कि वे दो बार हस्तिनापुर से विधायक बन चुके हैं और दो बार मंत्री भी बने हैं। उन्होंने एक मिथक का भी जिक्र किया कि हस्तिनापुर से एक बार विधायक बनने के बाद दोबारा कोई नहीं बन पाता, लेकिन उन्होंने इसे तोड़ा। अब तीसरी बार वे इस सीट से चुनाव लड़ने के इच्छुक नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने पार्टी के प्रति निष्ठा जताते हुए कहा कि भाजपा संगठन जहां से भी टिकट देगा, वे उसका सम्मान करेंगे और चुनाव लड़ेंगे।यह बयान ऐसे समय में आया है जब प्रदेश में पंचायत चुनाव निकट हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव की चर्चा शुरू हो चुकी है। 2022 के चुनाव में हस्तिनापुर सीट पर मुकाबला बेहद करीबी रहा था, जहां दिनेश खटीक ने सपा उम्मीदवार योगेश वर्मा को महज 7 हजार वोटों से हराया था। बसपा तीसरे नंबर पर रही थी।
कुछ रिपोर्ट्स में खटीक ने क्षेत्र के विकास पर भी असंतोष जताया। उन्होंने कहा कि 9 सालों में हस्तिनापुर में कोई बड़ा उद्योग या फैक्ट्री नहीं आई, रोजगार के अवसर नहीं बढ़े, जिससे युवा मजबूरी में काम कर रहे हैं।भाजपा की ओर से इस बयान पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक गलियारों में इसे मंत्री की व्यक्तिगत भावना माना जा रहा है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति और भाजपा की रणनीति पर इसका असर पड़ सकता है। दिनेश खटीक पार्टी के प्रमुख दलित चेहरों में से एक हैं और उनकी यह घोषणा आने वाले चुनावों में नई चर्चाओं को जन्म दे सकती है।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान सिर्फ पौराणिक संदर्भ तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय विकास और व्यक्तिगत राजनीतिक थकान का भी इशारा हो सकता है। देखना यह होगा कि भाजपा नेतृत्व इस पर क्या रुख अपनाता है।
Budaun Amarprabhat