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रामकथा सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु, संत रवि समदर्शी महाराज ने बताया—रामायण सिखाती है निज धर्म पर चलना

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बदायूं। भगवान परशुराम विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, नेकपुर में आयोजित श्रीराम कथा महोत्सव के दूसरे दिन सामाजिक संत रवि जी समदर्शी महाराज ने रामकथा का मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि रामायण मनुष्य को अपने धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलना सिखाती है। कथा संशय को दूर करती है और जीवन के दुख-संताप को समाप्त कर आत्मिक शांति प्रदान करती है।
उन्होंने बताया कि यह कथा परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। प्रयागराज में महर्षि भरद्वाज जी को, नीलांचल में कागभुशुण्डि ने पक्षियों के राजा गरुण जी को तथा कैलाश शिखर पर भगवान शिव ने माता पार्वती को रामकथा सुनाई। गोस्वामी तुलसीदास जी भी अपने मन को रामकथा सुनाते हुए कहते हैं कि रामायण जीवन को सही दिशा देने वाली पवित्र कथा है।
कथा के दौरान संत रवि समदर्शी महाराज ने राजा दक्ष के प्रजापति बनने, उनके द्वारा भगवान शिव का अपमान करने तथा सती को शिवजी द्वारा कथा सुनाने के प्रसंग को विस्तार से सुनाया। उन्होंने बताया कि कथा में मन न लगने पर सती अपने मायके गईं, जहां पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपमान से आहत होकर उन्होंने देह त्याग दी। इसके बाद शिवगणों ने यज्ञ विध्वंस कर दक्ष का सिर काट दिया। देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव ने बकरे का सिर लगाकर यज्ञ को पूर्ण कराया।
इसके बाद माता सती का पुनर्जन्म हिमालय और मेना के यहां पार्वती के रूप में हुआ। उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया। कथा में सप्तऋषियों द्वारा पार्वती की परीक्षा तथा शिव-पार्वती विवाह के प्रसंगों को भी संत ने अत्यंत भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
कथा के यजमान प्राचार्य एस.सी. मिश्रा, रामबहादुर पांडे, वाचस्पति मिश्र, के.के. उपाध्याय, के.एल. गुप्ता, लीला पांडे, राहुल पांडे, कुसुम सक्सेना, अमित पांडे, उत्पल विजय, आयुष भारद्वाज, आदित्य गुप्ता, अंकुश सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर प्रसाद ग्रहण किया।


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