16 अगस्त को सर्वार्थसिद्धि व अमृतसिद्धि योग में ही मनाया जाएगा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का विशेष पर्व वैदिक ज्योतिषाचार्य पंडित राहुल भारद्वाज
भाद्रपद जन्माष्टमी पर गृहस्थ व वैष्णव एक साथ जन्मोत्सव मनाएंगे और व्रत रखेंगे। भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि को हुआ था। इस साल की जन्माष्टमी पर काफी शुभ संयोग बन रहे हैं। जन्माष्टमी के दिन सर्वार्थसिद्धि व अमृतसिद्धि का अद्भुत योग बन रहा है। आइए जानते हैं कृष्ण जन्माष्टमी व्रत व पूजन की सही जानकारी इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 16 अगस्त को ही मानना शुभ रहेगा । वैदिक आचार्य राहुल भारद्वाज जी के अनुसार, श्री कृष्णश्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भरणी, कृतिका और रोहिणी नक्षत्र के भी योग हैं। जो इस दिन को और भी विशेष बना रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष के रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि को हुआ था। अष्टमी तिथि का प्रवेश शुक्रवार की रात 11 बजकर 48 बजे हो रहा है, लेकिन उदया तिथि में 16 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का मिलन नहीं हो रहा हो तो उदया तिथि को मान्यता देकर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जा सकती है। ऐसे में उदया तिथि के मुताबिक, 16 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। हालांकि, रोहिणी नक्षत्र 17 अगस्त की सुबह चार बजकर 38 मिनट पर लग रहा है।
16 अगस्त को जन्माष्टमी व्रत रखना उत्तम रहेगा जानें व्रत संकल्प-पूजा विधि, नियम व लाभ
हर साल भाद्रपद कृष्ण अष्टमी पर जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। लंबे समय के बाद इस बार जन्माष्टमी पर गृहस्थ व वैष्णव एक साथ जन्मोत्सव मनाएंगे और व्रत रखेंगे।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंदिरों में पूजा-पाठ व कीर्तन का आयेाजन होता है। लड्डू गोपाल को झूले में झुलाया जाता है। घरों में भी लोग गोपाल की पूजा की जाती है। मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का जन्मोत्सव मनाते हैं। भगवान को भोग लगाते हैं। पीले वस्त्र अर्पित करते हैं। इस दौरान श्रीधाम वृंदावन में ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में जन्म के बाद मंगला आरती होती है। उसमें शामिल होने के लिए काफी श्रध्दालु श्रीधाम वृंदावन के लिए रवाना होंगे। शहर के मंदिरों में तैयारियों को दिव्य रूप दिया जा रहा है।
इस बार कृष्ण जन्मोत्सव पर अमृतसिद्धि और सर्वार्थसिद्धि का अद्भुत योग बन रहा है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भरणी, कृतिका नक्षत्र के भी योग हैं, जो इस दिन को और भी विशेष बना रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार, मथुरा के अत्याचारी राजा कंस को भविष्यवाणी सुनकर डर लग गया कि देवकी का आठवां पुत्र उसे मारेगा, इसलिए उसने देवकी और उनके पति वासुदेव को जेल में बंद कर दिया तथा पहले सात बच्चों को मार परन्तु आठवें पुत्र का जन्म होने के समय मध्य रात्रि बिजली चमकी, ताले अपने आप खुल गए और भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। वासुदेव ने श्रीकृष्ण को सुरक्षित गोकुल में नंद माता-पिता के यहां पहुंचाया, जबकि अपनी बेटी को कंस के हवाले किया। बाद में भगवान कृष्ण ने कंस का वध कर दंड दिया और अधर्म का अंत किया।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत और में पूजन के बारे में आचार्य राहुल भारद्वाज जी ने बताया ने कि प्रातः काल सूर्योदय पूर्व स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर भगवान कृष्ण की प्रतिमा का गंगा जल और दूध से अभिषेक करवाकर, नए वस्त्र पहनाकर हैं। फूल, फल, मिठाई व मिश्री से भोग लगायें। पूरे दिन उपवास का संकल्प लेकर सात्विक रहकर रात्रि में श्री कृष्ण जी की प्रतिमा को पंचामृत से अभिषेक करवाकर फिर चंद्र दर्शन कर अर्घ्य देकर खीरे से भोग फल में प्रतिमा स्थापित कर , महाआरती और स्तुति आदि का पाठ करने के बाद व्रत का पारण करें और माखन मिश्री का भोग लगाकर प्रसाद वितरण करें।जन्माष्टमी व्रत रखने के लाभ- जन्माष्टमी का व्रत और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने से संतान की कामना की पूर्ति होती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर कृष्ण जी को पूजने वाले लोग अपनी इंद्रियों पर विजय पाते हैं।
ज्योतिषाचार्य पंडित राहुल भारद्वाज (वैदिक)
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