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वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर काव्य गोष्ठी, देर रात तक गूंजा राष्ट्रप्रेम

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संवाददाता | गोविंद देवल
बदायूँ। राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में सोमवार 23 दिसंबर 2025 को शैलेन्द्र मिश्र देव के आवास पर एक भव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि श्री महेश मित्र ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. उमाशंकर राही उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन सुनील शर्मा समर्थ ने किया।
गोष्ठी का शुभारंभ माता सरस्वती के चित्र पर डॉ. उमाशंकर राही, श्री महेश मित्र एवं डॉ. अरविंद धवल द्वारा माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात राजवीर सिंह तरंग ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
पहली काव्य प्रस्तुति शैलेन्द्र मिश्र देव ने दी—
“देश प्रेम की मिसाल गीत वंदे मातरम,
देश के लिए सदा पुनीत वंदे मातरम।”
संचालक सुनील शर्मा समर्थ ने अपने काव्य पाठ में कहा—
“जीवन को सुखमय करे भरे हृदय में प्रीति,
जन-जन का है प्राणधन वंदे मातरम् गीत।”
राजवीर सिंह तरंग ने आज़ादी के उत्सव को समर्पित पंक्तियाँ पढ़ीं, वहीं बदायूँ के उस्ताद शायर सुरेन्द्र नाज़ ने सामाजिक सरोकार से जुड़ी रचना सुना कर खूब तालियां बटोरीं। अचिन मासूम की देशभक्ति से ओतप्रोत कविता ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
डॉ. अरविंद धवल ने वंदे मातरम् को भारत की आत्मा बताते हुए ओजस्वी प्रस्तुति दी। मुख्य अतिथि डॉ. उमाशंकर राही ने अपने काव्य पाठ में युवाओं को राष्ट्र और मानवता की पहचान बनकर जीने का संदेश दिया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री महेश मित्र ने कहा कि वंदे मातरम् मातृभूमि की महिमा और गौरव को बढ़ाने वाला अमर गीत है। वक्ता श्री उमेश शास्त्री ने इसे आधुनिक भारत की आत्मा का गीत बताया। प्रसिद्ध संचालक रविंद मोहन सक्सेना ने कहा कि आज़ादी के आंदोलन के समय ही वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा मिल चुका था, इसलिए इसका विरोध निरर्थक है।
कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से कवियों का उत्साह बढ़ाया। गोष्ठी देर रात तक चली, जिसमें एक से बढ़कर एक रचनाओं की प्रस्तुति हुई। कार्यक्रम में लोकेश पाठक, उमेश शास्त्री, रवि सारस्वत, सुरेश शर्मा, पुष्पेंद्र शर्मा सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।


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