बिसौली। सिद्व बाबा इंटर कॉलेज शरह बरौलिया के मैदान पर चल रही नौ दिवसीय रामकथा के सातवें दिन रविवार को श्रीराम–भरत मिलाप का मार्मिक प्रसंग सुनाया गया। कथा वाचक प्रेममूर्ति पंकज मिश्र के भावपूर्ण वर्णन को सुनकर श्रद्धालु श्रोता भाव-विभोर हो उठे और वातावरण भक्तिमय हो गया।
कथा वाचक पंकज मिश्र ने कहा कि श्रीराम के वनवास का समाचार पाकर ननिहाल से लौटे भरत ने अवध का राजसिंहासन स्वीकार करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। वे राम, जानकी और लक्ष्मण से मिलने के लिए व्याकुल हो उठे और अवधवासियों के साथ श्रीराम को खोजते हुए चित्रकूट पहुंचे। वहां यज्ञवेदी के पास मृगछाला पर जटाधारी व वल्कल धारण किए श्रीराम को देखकर भरत दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने भरत और शत्रुघ्न को हृदय से लगा लिया और माता-पिता व अयोध्या का कुशलक्षेम पूछा।
भरत ने श्रीराम को बताया कि उनके धर्मपरायण पिता राजा दशरथ स्वर्ग सिधार गए हैं और माता कैकेयी के कारण लगे कलंक से उनका हृदय व्यथित है। उन्होंने श्रीराम से अयोध्या लौटकर राज्य संभालने का आग्रह किया। इस पर श्रीराम ने वनवास की अवधि पूर्ण कर अयोध्या लौटने का वचन देते हुए भरत के अनुरोध को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया।
भरत ने कहा कि वे राजमुकुट स्वीकार नहीं करेंगे, ऐसे में राज्य का संचालन कैसे होगा। तब उन्होंने श्रीराम से उनकी चरण पादुका देने का निवेदन किया, ताकि उन्हें सिंहासन पर विराजमान कर एक सेवक की भांति राजकाज का संचालन कर सकें। इस प्रसंग ने श्रोताओं की आंखें नम कर दीं।
कथा स्थल पर सत्यपाल शर्मा, वृजेश शंखधार (सभापति सहकारी समिति), सत्यदेव मिश्रा, गोविन्द मिश्र, टिंकू कटिया, चरण सिंह लेखपाल, अमित शंखधार, ठाकुर देवपाल सिंह, सुरेंद्र शर्मा, राकेश शंखधार, संजय उपाध्याय, सेठ मनोहर लाल गुप्ता, गवेन्द्र पाठक, अवनीश पाठक, ब्रह्मनन्द शर्मा, हरद्वारी लाल कटिया, योगेश गुप्ता, नेत्रपाल कटिया, राजीव कटिया, नीरज शर्मा, अनिल आचार्य, महेश पाठक, रामौतार मुनीम जी, प्रसुनिका शर्मा, नेहा शर्मा, शिवी शर्मा, हरप्यारी, चन्द्रमुखी देवी, लीलावती, सोमवती, वृजवाला मौर्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
Budaun Amarprabhat