Breaking News

भाजयुमो प्रदेश अध्यक्ष की रेस: क्या इस बार खत्म होगा क्षत्रिय समाज का लंबा इंतजार?

Spread the love

​लखनऊ/दिल्ली। उत्तर प्रदेश भाजपा में संगठन के पुनर्गठन की प्रक्रिया तेज होते ही सियासी गलियारों में कयासों का दौर शुरू हो गया है। पिछड़ा वर्ग से प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद अब यह माना जा रहा है कि भाजयुमो (युवा मोर्चा) की कमान किसी सामान्य वर्ग के युवा चेहरे को सौंपी जा सकती है। इस रेस में सबसे प्रमुख दावा क्षत्रिय समाज की ओर से उभर कर आ रहा है।
​जातीय समीकरण और समाज की उम्मीदें
​सियासी जानकारों का मानना है कि दयाशंकर सिंह के कार्यकाल के बाद से अब तक युवा मोर्चा का कोई क्षत्रिय अध्यक्ष नहीं बना है। हाल के वर्षों में हरीश द्विवेदी, सुब्रत पाठक, आशुतोष राय और प्रांशु दत्त द्विवेदी के रूप में ब्राह्मण चेहरों ने मोर्चे का नेतृत्व किया है। ऐसे में क्षत्रिय समाज इस बार अपनी मजबूत राजनीतिक भागीदारी की उम्मीद कर रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसी समाज से आते हैं, लेकिन एक ‘संत’ की उनकी छवि और सर्वसमावेशी राजनीति के कारण समाज का एक धड़ा मानता है कि संगठन में युवाओं को अलग से प्रतिनिधित्व मिलना जरूरी है।
​अयोध्या बनाम मऊ: दो दिग्गजों के बीच कड़ा मुकाबला
​युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद के लिए वर्तमान में दो नाम सबसे प्रमुखता से उभरे हैं, जिनके बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है।
​अयोध्या के प्रदेश पदाधिकारी: इन्हें इस रेस में सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा है। इनकी सबसे बड़ी ताकत दिल्ली के एक प्रभावशाली ‘कद्दावर नेता’ (भाई साहब) का संरक्षण है। चर्चा है कि केंद्रीय स्तर पर मजबूत पकड़ होने के कारण इनका पलड़ा भारी है। हालांकि, यही मजबूती उनकी कमजोरी भी बन सकती है, क्योंकि स्थानीय स्तर (लखनऊ) पर दिल्ली की टीम के वर्चस्व को लेकर हिचकिचाहट देखी जा सकती है।
​मऊ के राष्ट्रीय नेता: दूसरे बड़े दावेदार मऊ से आते हैं जिनका राष्ट्रीय स्तर पर रसूख है। लेकिन इनके साथ कुछ विवाद जुड़े हैं। चर्चाओं के मुताबिक, उनके परिवार की अतीत में मुख्तार अंसारी के साथ कथित व्यापारिक साझेदारी रही है, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के चलते उनकी राह में बड़ा रोड़ा बन सकती है।
​निष्कर्ष: दिल्ली का आशीर्वाद या लखनऊ की मुहर?
​इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में अयोध्या के दावेदार फिलहाल अपनी ‘दिल्ली कनेक्टिविटी’ के कारण आगे नजर आ रहे हैं, वहीं मऊ के नेता अपनी ‘पॉवर’ और रसूख के दम पर रेस में बने हुए हैं। दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही उम्मीदवारों की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी उनके ‘अभिभावक’ (संरक्षक) ही हैं।
​अब देखना यह होगा कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जातीय संतुलन और भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधता है। क्या अयोध्या का ‘हर्ष’ जीतेगा या मऊ की ‘पॉवर’ अपना रंग दिखाएगी?


Spread the love

About Budaun Amarprabhat

Check Also

बाबा इंटरनेशनल स्कूल में हुआ रावण दहन, विद्यार्थियों ने किया रामायण प्रसंगों का मंचन

Spread the love# **बिल्सी।** बाबा इंटरनेशनल स्कूल में बुधवार को दशहरा पर्व के उपलक्ष्य में …