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श्राद्ध केवल एक अनुष्ठान नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परिवार की श्रद्धा का है जीवंत प्रतीक : सपना*

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*श्राद्ध केवल एक अनुष्ठान नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परिवार की श्रद्धा का है जीवंत प्रतीक : सपना*
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👉 *सनातन ध्वजवाहिका सपना गोयल पितृपक्ष में दिया संदेश*

👉 *सुंदरकांड के पाठ से पितृ आनंदित होकर देते हैं आशीर्वाद*

*लखनऊ।* “ईश्वरीय स्वप्नाशीष सेवा समिति” की सनातन ध्वजवाहिका सपना गोयल की अगुआई में गुरुवार 18 सितम्बर को पितृ पक्ष के पावन अवसर पर संदेश दिया गया कि पितृपक्ष में सुंदरकाण्ड के पाठ से न केवल पितृ प्रसन्न होते हैं बल्कि आशीर्वाद भी देते हैं। हनुमान महाराज की कृपा से समस्त संकट ही दूर नहीं होते बल्कि सम्पूर्ण जीवन ही सुंदर बन जाता है। इस क्रम में आगामी शनिवार 20 सितम्बर को अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि परिसर में 12वां सुंदरकांड का पाठ किया जाएगा।

सनातन ध्वजवाहिका सपना गोयल ने गुरुवार को सनातन सेवा कार्य कर रहीं मातृशक्तियों को संदेश दिया कि हिंदू संस्कृति में श्राद्ध केवल एक अनुष्ठान नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा, कृतज्ञता और पारिवारिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है।

श्राद्ध का वास्तविक उद्देश्य अपने पितरों को स्मरण करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और उनके आशीर्वाद से परिवार को सुख-समृद्धि की ओर अग्रसर करना है। इसी क्रम में जब श्राद्ध काल में सुंदरकांड का पाठ किया जाता है, तो यह न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि आध्यात्मिक और पारिवारिक दृष्टि से भी अत्यंत फलदायी सिद्ध होता है। उन्होंने बताया कि सुंदरकांड, रामचरितमानस का हृदय कहा गया है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के पाँचवें कांड को सुंदरकांड इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें हनुमानजी की भक्ति, पराक्रम और बुद्धिमत्ता का सुंदर चित्रण किया गया है। इसमें माता सीता की करुणा, धैर्य और पवित्रता का उल्लेख है। इसमें श्रीराम के संदेश का दिव्य सौंदर्य दिखता है। इसके पाठ से कठिन से कठिन संकट दूर हो जाता है।

विभिन्न ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध कर्म के साथ जब भक्ति, जप, पाठ और यज्ञ जुड़े हों, तो पितरों को विशेष तृप्ति प्राप्त होती है। कहा भी गया है कि पितरों की पूजा और तृप्ति के बिना देवपूजन भी अधूरा है। हनुमान महाराज को कलयुग के साक्षात संकटमोचक कहा गया है। जब उनके पराक्रम और भक्ति से युक्त सुंदरकांड का पाठ श्राद्ध काल में किया जाता है, तो पितरों को विशेष संतोष और आनंद की प्राप्ति होती है। ऐसे में पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं।

इसलिए श्राद्ध काल में सुंदरकांड पाठ करने से विशेष लाभ मिलता है। पितृ सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों के घर आते हैं। भक्ति और स्तुति से युक्त सुंदरकांड उनके लिए दिव्य रस की अनुभूति कराता है। जिस प्रकार जल, तिल और अन्न से पितरों की देह तृप्त होती है, वैसे ही सुंदरकांड के मंत्रों और चौपाइयों से उनकी आत्मा तृप्त होती है।

पितृ प्रसन्न होकर अपने वंशजों के परिवार को संतति-सुख, धन-समृद्धि और संकट-निवारण का वरदान देते हैं। दूसरी ओर सुंदरकांड की शक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। श्राद्ध काल में किए गए सुंदरकांड पाठ से घर में नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और परिवार में सौहार्द्र और शांति बढ़ती है। मानसिक तनाव घटता है और स्वास्थ्य लाभ होता है।

इससे परिवार भी भक्ति मार्ग पर अग्रसर होता है। वास्तव में श्राद्ध केवल कर्मकांड का विषय नहीं है, बल्कि वह आत्मीयता और कृतज्ञता का पर्व है। जब इसमें सुंदरकांड का पाठ जोड़ा जाता है, तो यह न केवल पितरों को आनंदित करता है बल्कि पूरे परिवार के लिए मंगलकारी सिद्ध होता है। इससे पितरों की आत्मा तृप्त होती है। परिवार में सुख-समृद्धि आती है और जीवन की हर कठिनाई दूर होती है। रामभक्ति और हनुमान कृपा का सुखद अनुभव होता है।

सनातन ध्वजवाहिका सपना गोयल के अनुसार सुंदरकांड महायज्ञ अनुष्ठान करने का एकमात्र उद्देश्य, संतों और देवों की भूमि भारतवर्ष को विश्व में दोबारा विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना और हिन्दुस्तान विरोधी असुरीय शक्तियों के दमन हेतु प्रार्थना करना है।

“सुंदरकांड महा अभियान, भारत वर्ष की बने पहचान” के तहत जिलों से लेकर दिलों तक को जोड़ा जा रहा है। यह अभियान देश ही नहीं विदेशों तक में संचालित किया जा रहा है। सनातन ध्वजवाहिका सपना गोयल के अनुसार सुंदरकांड के नियमित पाठ से केवल सनातनियों का ही नहीं बल्कि हर समाज के अनुयायियों का कल्याण सम्भव है।


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