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तरही मुशायरे में गूंजा मिसरा ‘बहुत मशहूर हैं किस्से हमारे’, शायरों ने बांधा समां

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बदायूं। बदायूं बीती रात चराग-ए सुखन संस्था की ओर से मोहल्ला सोथा स्थित फरशोरी मंजिल में मासिक तरही मुशायरे का आयोजन किया गया। मिसरा-ए-तरह “बहुत मशहूर हैं किस्से हमारे” पर शायरों ने अपनी-अपनी कलमी पेश कर महफिल को यादगार बना दिया।
मुशायरे की सदारत मशहूर उस्ताद शायर डॉ. मुजाहिद नाज़ बदायूंनी ने की, जबकि निज़ामत कुमार आशीष ने संभाली। आगाज़ शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने नात-ए-पाक से किया।
सदर-ए-मुशायरा डॉ. मुजाहिद नाज़ बदायूंनी ने पढ़ा—
हमें है नाज़ उर्दू बोलते हैं,
बड़े शाइस्ता हैं लहजे हमारे।
वरिष्ठ शायर सुरेन्द्र नाज़ बदायूंनी ने कहा—
थी अबकी जंग अपनों से हमारी,
कहाँ तक हौसले लड़ते हमारे।
सादिक अलापुरी ने अपने अंदाज़ में पढ़ा—
अगर मुंह से बुरी बातें न निकले,
तो फिर हों चांद से चेहरे हमारे।
शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने गजल सुनाई—
हमें ढोना पड़ा तन्हा बुढ़ापा,
हुए बागी सभी बेटे हमारे।
ये जंगल भी हमारी मिल्कियत है,
हैं सारे शेर और चीते हमारे।
कार्यक्रम संयोजक आज़म फ़रशोरी ने पढ़ा—
नहीं अब ज़र्रे भी अपने हमारे,
कभी हाँ चाँद तारे थे हमारे।
अरशद रसूल ने कहा—
ढिंढोरा खूब पीटा जा रहा है,
मगर आए न दिन अच्छे हमारे।
डॉ. दानिश बदायूंनी ने अशआर पेश किए—
वह जाकर जब मिले दिल से हमारे,
हुए तब खत्म सब शिकवे हमारे।
निज़ामत कर रहे कुमार आशीष ने तरन्नुम में पढ़ा—
कभी रहते थे हम सब साथ मिलकर,
अना ने कर दिए टुकड़े हमारे।
उज्ज्वल वशिष्ठ ने नई पीढ़ी पर टिप्पणी करते हुए कहा—
नए बच्चों की टीशर्टों में दबकर,
कहीं पर खो गए कुर्ते हमारे।
अंत में संयोजक अल्हाज आज़म फरशोरी ने सभी मेहमानों का शुक्रिया अदा किया। अगली मासिक तरही नशिस्त 24 मार्च को आयोजित करने की घोषणा की गई, जिसका मिसरा-ए-तरह होगा— “वो दरिया हो के भी ‘दरिया’ नहीं है।”
इस अवसर पर अल्हाज सालिम फरशोरी, रजत गौड़, आहिल रसूल सहित अन्य शायर और श्रोता मौजूद रहे।


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