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चंद्रग्रहण के कारण 2 मार्च को होगा होलिका दहन, 3 मार्च को ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण

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संवाददाता: गोविंद देवल
बदायूं। संवत् 2082 में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर पड़ रहे खग्रास/ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण के कारण इस वर्ष होलिका दहन की तिथि को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। इस संबंध में ज्योतिषाचार्य पं. राहुल भारद्वाज ने शास्त्रीय आधार स्पष्ट करते हुए बताया कि 2 मार्च 2026, सोमवार को प्रदोषकाल में होलिका दहन करना ही शास्त्रसम्मत एवं शुभ रहेगा।
पं. राहुल भारद्वाज ने बताया कि शास्त्रीय गणना के अनुसार 3 मार्च 2026 को पूर्णिमा तिथि सूर्यास्त से पूर्व ही समाप्त हो रही है, जबकि उसी दिन चंद्रग्रहण भी लग रहा है। सामान्य नियम के अनुसार होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में प्रदोषकाल में किया जाता है, किंतु जब पूर्णिमा प्रदोषकाल में उपलब्ध न हो तथा ग्रहण की स्थिति बन रही हो, तब धर्मशास्त्रों में विशेष निर्देश दिए गए हैं।
उन्होंने बताया कि प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथ धर्मसिंधु में स्पष्ट उल्लेख है कि यदि दूसरे दिन ग्रस्तोदय ग्रहण हो और प्रदोषकाल में पूर्णिमा तिथि न रहे, तो होलिका दहन पूर्व दिवस में किया जाना चाहिए। इसी आधार पर 2 मार्च को प्रदोषकाल में दहन करना उचित रहेगा।
भद्रा का समय और दहन का मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य के अनुसार 2 मार्च को सायं 5:56 बजे से भद्रा प्रारंभ होकर 3 मार्च प्रातः 5:26 बजे तक रहेगी। शास्त्रों में भद्रा को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है, किंतु यदि भद्रा निशीथकाल (मध्य रात्रि) के बाद तक व्याप्त हो तो प्रदोषकाल में भद्रा का ‘मुख’ त्यागकर होलिका दहन किया जा सकता है।
इस वर्ष प्रदोषकाल (सूर्यास्त से लगभग 2 घंटे 24 मिनट तक) में भद्रा का मुख नहीं रहेगा, जिससे प्रदोष वेला में होलिका दहन करना शास्त्रोक्त एवं मंगलकारी माना जाएगा।
3 मार्च को ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण
फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा, मंगलवार 3 मार्च 2026 को चंद्रग्रहण घटित होगा। भारतीय समयानुसार चंद्रमा का विरल छाया में प्रवेश दोपहर 2:14 बजे, स्पर्श 3:20 बजे, सम्मिलन 4:35 बजे, मध्य 5:04 बजे, उन्मीलन 5:33 बजे, मोक्ष 6:47 बजे तथा विरल छाया से निर्गमन 7:53 बजे होगा।
यह ग्रहण भारत में चंद्रोदय से पूर्व ही प्रारंभ हो जाएगा, जिससे सम्पूर्ण भारत में यह ग्रस्तोदित चंद्रग्रहण के रूप में दृश्य होगा। ग्रस्तोदित ग्रहण की स्थिति में चंद्रमा उदय के समय ग्रहणग्रस्त दिखाई देता है।
सूतक का प्रभाव
चंद्रग्रहण का सूतक सामान्यतः छह घंटे पूर्व माना जाता है, किंतु ग्रस्तोदित ग्रहण की स्थिति में सूतक का विचार विशेष रूप से किया जाता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार ऐसे ग्रहण में सूतक पूर्ववर्ती दिन से प्रभावी माना जा सकता है। सूतक काल में भोजन, पूजन, देवप्रतिमा स्पर्श एवं शुभ कार्यों से परहेज करने की परंपरा है।
श्रद्धालुओं से अपील
पं. राहुल भारद्वाज ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया है कि वे भ्रम की स्थिति से बचें और शास्त्रसम्मत विधि के अनुसार 2 मार्च 2026 को प्रदोषकाल में ही होलिका दहन करें। उन्होंने कहा कि ग्रहण और तिथि विचार को ध्यान में रखते हुए ही धर्मशास्त्रों ने यह व्यवस्था निर्धारित की है, जिससे पर्व की शुद्धता और शुभता बनी रहे।


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