
मुरादाबाद। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी कवि सम्मेलन के नायक तारक मेहता का उल्टा चश्मा में तारक मेहता फेम रहे शैलेश लोढ़ा अपनी अनूठी प्रस्तुति और हास्य-व्यंग्य से मेहमानों और हजारों-हजार स्टुडेंट्स को खूब गुदगुदाया। व्यंग्यकार गोविंद राठी ने समाज की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए अपने शब्दों से सर्जरी की मानिंद काम किया। वीर रस के कवि अशोक चारण की प्रभावी आवाज, अदायगी, त्वरित हास्य बोध से खूब वाहवाही लूटी। चारण ने जोशीली कविताओं के जरिए देशभक्ति की अलख जगा दी। हास्य कवि चेतन चर्चित ने जहां हंसी के ठहाकों से गुदगुदाया, वहीं अपनी रचनाओं से समाज को गहरा संदेश भी दे गए। श्रृंगार रस की कवयित्री मनु वैशाली के प्रेम गीतों पर पूरा पंड़ाल झूमता नज़र आया। गीतकार अभिसार गीता शुक्ल ने प्रेम और विरह की रचनाओं से देर रात तक श्रोताओं को बांधे रखा। इससे पूर्व मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलन और माल्यार्पण के संग कवि सम्मेलन का शंखनाद हुआ। कुलाधिपति श्री सुरेश जैन के संग-संग मेहमान कवियों, जीवीसी मनीष जैन, एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर अक्षत जैन, अनिल जैन आदि की इस मौके पर उल्लेखनीय मौजूदगी रही। इससे पूर्व सभी कवियों को बुके देकर और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। अंत में सभी को स्मृति चिन्ह भी भेंट किए गए। संचालन की कमान व्यंग्यकार गोविंद राठी ने संभाली तो अध्यक्षता शैलेश लोढ़ा ने की।
शैलेश लोढ़ा ने भारत की बड़ी आबादी की कहानी पर केंद्रित अपनी कविता- जिंदगी मुझे तुझसे प्यार है… को कुछ इस तरह बयां किया-

बच्चों के टूटे खिलौनों को कितनी बार जोड़ पाऊंगा
बीबी की फटी साड़ी में से झांकेंगे सपने
आखिर वही तो हैं अपने
भले ही हर दिन बोझ हो, और खुद पर उधार है
तू जैसी भी है जिंदगी मुझे तुझसे प्यार है।
टीएमयू की तीन पीढ़ियों को एक साथ देखकर लोढ़ा बोले-
छत नहीं रहती, दहलीज नहीं रहती, दीवारों दर नहीं रहता,
घर में बुजुर्ग न हों तो घर, घर नहीं रहता।
बालीवुड के गानों में व्याप्त अश्लीलता पर प्रहार किया-
हम जिम्मेदारी समझते हैं वतन की, इसीलिए कलम उठाते हैं,
हम फकीर ही सही मगर हम औरत की अस्मिता नहीं गिराते हैं।
समाज में रिश्तों में खत्म होते भरोसे पर बोले-
गज़ल वही रहती है, उन्मूल बदल जाते हैं
अदालत तक जाते-जाते बयान बदल जाते हैं।
उन लोगों पर कभी भरोसा न कीजै
हर साल जिनके घर मेहमान बदल जाते हैं।
अपनी फेसम कविता- उसने उसका नाम अनामिका रख दिया… के जरिए समाज में आर्थिंक और सामाजिक भेदभाव पर भी करारा व्यंग्य किया।
श्रृंगार रस की कवयित्री मनु वैशाली ने मां सरस्वती को प्रणाम करते हुए कवि सम्मेलन का आगाज़ किया-
मात वीणा वादिनी इतना अगर कर दे
मैं रहूं या न रहूं मेरा देश अमर कर दे
भीड़ से गदगद श्रोताओं के सम्मान में कहा-
सकल संसार के विस्तार से सजाकर रखा है।
हमारी कल्पनाओं से बहुत अच्छा बनाकर रखा है।
जमाना घूम आए हम मगर देखा नहीं ऐसा,
खुदा कुछ नहीं बना पाया, बनाकर तुमको ऐसा लगता है।
उन्होंने जैसे ही अपनी चर्चित कविता मोहिनी सुनाईं तो पंड़ाल तालियों से गूज उठा।
उंगली लपेट लट कर अटखेलियां तो,
रुप से रति के जीत करे मोहिनी
चटकीली चितवन चंलला चकोरी कि
चांद पे ही चांदनी उधार करे मोहिनी
शौर्य गाथाओं के कलमकार अशोक चारण ने कहा,
जिन्ना के बच्चों बच नहीं पाते यूक्रेन में,
हाथों में अगर तिरंगा नहीं लेते।
अब्बा ने तुम्हारे बताया नहीं शायद तुम्हें,
बाप, बाप होता है, बाप से कभी पंगा नहीं लेते।
टीएमयू परिवार के सम्मान में कुछ यूं कहा-
तीन पीढ़ी इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं,
पिता, पिता के चरणों में अक्षत चढ़ा रहे हैं।
अंत में उन्होंने वीर रस की कविता- मेरी मौत को मिले तिरंगा मर कर भी जी जाऊंगा सुनाकर श्रोताओं में जोश भर दिया।
व्यंग्यकार गोविन्द राठी ने पेड़ और उल्लू की पैरॉडी से राजनीति पर करारा कटाक्ष किया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी रचना- श्मशानघाट का उद्घाटन के जरिए वीवीआईपी कल्चर, राजनीति और रीति-रिवाजों पर भी जमकर तीखी चोट की।
मां की महिमा का उन्होंने बखान यूं किया-
बस एक मां की मुहब्बत दिखाई देती है।
कायनात में एक ही हूर दिखाई देती है।
बूढी मां तेरी झुर्रियों की कसम,
हर एक लकीर में जन्नत दिखाई देती है।
गीतकार अभिसार गीता शुक्ल ने युवाओं के लिए कहा-
उदासी चखती रहती है, दुखों को धार देती है।
मुहब्बत कुछ नहीं करती लड़कों को मार देती है।
छेड़छाड़ पर यूं बोले-
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इश्क है तो कोई और इशारा करिए,
पर भरी वज्म में यूं आंख न मारा करिए।
अंत में उन्होंने रावण अंगद संवाद पर राम गीत- जो धर्म की रक्षा को देख… सुनाया तो पूरा पंडाल श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा।
कॉमेडियन चेतन चर्चित ने सामाजिक नासूर- दहेज, जुआ, शराब, पर्यावरण संरक्षण आदि पर काव्य पाठ किया।
सब्र के बांध पर खड़ा होना पड़ा, जिम्मेदारियां लीं और बड़ा होना पड़ा।
मजबूरियों ने ऐसे मोड़ पर ला दिया, वक्त से पहले बड़ा होना पड़ा
राष्ट्रीय एकता का कोई धर्म नहीं होता है।
वसुदैव कुटुम्बकम से बड़ा कोई कर्म नहीं होता है।
कवि सम्मेलन में कुलाधिपति परिवार से फर्स्ट लेडी श्रीमती वीना जैन, श्रीमती ऋचा जैन, श्रीमती जहान्वी जैन, सुश्री नंदिनी जैन, वीसी प्रो. वीके जैन, सीओ हाईवे राजेश कुमार, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष आनन्द मोहन, दैनिक जागरण के पूर्व प्रबंधक अनिल अग्रवाल, उद्योगपति राजेश रस्तोगी के अलावा टीएमयू परिवार से अभिषेक कपूर, प्रो. हरबंश दीक्षित, प्रो. एमपी सिंह, प्रो. आरके द्विवेदी, मनोज जैन, प्रो. विपिन जैन, डॉ. विपिन जैन, डॉ. रवि जैन आदि की भी गरिमामयी मौजूदगी रही।

टीएमयू में कवि शैलेश लोढ़ा बोले, पैर छूने
सरीखे संस्कार को जीवंत रखने की दरकार
दीक्षांत समारोह के अंतिम दिन तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद में आयोजित कवि सम्मेलन में हास्य-व्यंग्यकार, अभिनेता एवम् लेखक श्री शैलेश लोढ़ा स्वामी महावीर का भावपूर्ण स्मरण करते हुए कहा, दुनिया में संभावित तीसरे युद्ध के मद्देनज़र भगवान महावीर के सिद्धांतों की प्रासंगिक पर बोले, 2600 साल बाद भी भगवान महावीर आज भी अनुकरणीय हैं, क्योंकि जो शस्त्र ग्रहण करता है वह वीर होता है, लेकिन जो शस्त्र त्याग करता है वहीं महावीर कहलाता है। टीएमयू की तीन पीढ़ियों- कुलाधिपति सुरेश जैन, ग्रुप वाइस चेयरमेन मनीष जैन और एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर अक्षत जैन को साधुवाद देते हुए बोले, मैं जीवन में पहली बार देख रहा हूं, तीन पुश्तें संग-संग शिक्षा, संस्कृति और साहित्य की समृद्धि के प्रति समर्पित हैं। उन्होंने ओपन थियेटर में स्टुडेंट्स के विशाल समूह से मुखातिब होते हुए कहा, संस्कृति और सभ्यता को बचाने के लिए स्टुडेंट्स को मोबाइल से दूरी बनानी होगी। मोबाइल को छोड़कर किताबों को आत्मसात करना होगा, क्योंकि बुक्स हमारी सच्ची मित्र हैं। न तो वे डिस्चार्ज होती हैं। न सिग्नल डाउन होता है। न ही मोबाइल की फ्लैश मानिंद नेत्रों को कमजोर करती हैं। हमें युवाओं पर भरोसा करना होगा, क्योंकि युवा ही सभ्यता, संस्कृति और साहित्य के ध्वज वाहक हैं।
अभिभावकों को अनमोल सलाह देते हुए बोले, वे अपने बच्चों की तुलना कभी भी दूसरों से न करें। साथ ही स्टुडेंट्स को भी सफलता के टिप्स देना नहीं भूले, बोले- वे जीवन में कभी निराश न हों। असफल होने पर भगवान पर विश्वास करते हुए अपना कर्म करें। साथ ही बोले, इश्क कहा नहीं, किया जाता है। मुहब्बत में शब्दों से ज्यादा इमोशन जरूरी है। दुनिया में कलम की ताकत को सर्वोपरि बताते हुए बोले, विश्व में जो भी क्रांति, बदलाव, आन्दोलन आदि कलम की ताकत से ही हुए हैं। श्री लोढ़ा ने लघु कहानी सुनाते हुए आत्म विश्वास और अति आत्म विश्वास की व्याख्या भी की। अंग्रेजी को महज लैंग्वेज बताते हुए बोले, भारतीय भाषाएं ज्ञान की त्रिवेणी हैं। भारतीय भाषाओं में सच्चे रिश्ते हैं। अपनापने की खुशबू है। उन्होंने तेजी से गिरती संस्कृति पर चिंता जताते हुए कहा, अनुज पैर छूने की भारतीय संस्कृति को जीवंत रखे। दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा मुल्क हैं, जहां पैर छूने की परम्परा है। हमें अपने बच्चों को पैर छूने की संस्कृति से इसलिए दूर नहीं रखना चाहिए क्योंकि वे भी तो जाने, पांव के नीचे जो छाले हैं, उन्हीं ने तो बच्चे पाले हैं।
Budaun Amarprabhat

