पर्सीड उल्का वर्षा का चरम, आधी रात के बाद से भोर तक दिखेगा अद्भुत नजारा
बदायूं। अगस्त का महीना खगोल प्रेमियों के लिए खास होने जा रहा है। 12 और 13 अगस्त की दरम्यानी रात आसमान में पर्सीड उल्का वर्षा का चरम देखने को मिलेगा। खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार इस दौरान मौसम साफ रहने और प्रकाश प्रदूषण कम होने पर भारत के विभिन्न हिस्सों से चमकीली उल्काएं देखी जा सकती हैं। खास बात यह है कि इस अवधि में चंद्रमा की तेज रोशनी से अपेक्षाकृत कम बाधा रहने के कारण अंधेरे स्थानों से नजारा बेहतर रहने की संभावना है।
आधी रात के बाद से भोर तक बेहतर अवसर
पर्सीड उल्का वर्षा 17 जुलाई से 24 अगस्त तक सक्रिय रहती है, लेकिन इसका अधिकतम गतिविधि काल 12-13 अगस्त के आसपास रहेगा। भारतीय समय के अनुसार रात करीब 12 बजे से सुबह 4:30 बजे तक उल्काओं को देखने का अच्छा अवसर रहेगा। 13-14 अगस्त की रात भी कुछ उल्काएं देखी जा सकती हैं।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उल्काओं को देखने के लिए टेलीस्कोप या दूरबीन की आवश्यकता नहीं है। नंगी आंखों से खुले आसमान का विस्तृत क्षेत्र देखने पर अधिक बेहतर अनुभव मिलेगा। शहरों की रोशनी से दूर ग्रामीण या कम प्रकाश प्रदूषण वाले स्थान इस खगोलीय घटना के अवलोकन के लिए अधिक उपयुक्त रहेंगे।
एक घंटे में 60 से 100 उल्काओं की संभावना
आदर्श परिस्थितियों में पर्सीड उल्का वर्षा की दर लगभग 60 से 100 उल्का प्रति घंटा तक बताई जाती है। हालांकि यह ZHR यानी Zenithal Hourly Rate की सैद्धांतिक दर है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति को हर घंटे इतनी ही उल्काएं दिखाई देंगी। वास्तविक संख्या मौसम, प्रकाश प्रदूषण, क्षितिज की स्थिति, रेडिएंट की ऊंचाई और देखने की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
क्या है पर्सीड उल्का वर्षा
पर्सीड कोई अंतरिक्ष से गिरने वाली आग की धार नहीं है। यह पृथ्वी के उस क्षेत्र से गुजरने के कारण दिखाई देने वाली वार्षिक उल्का वर्षा है, जहां धूमकेतु 109P/Swift-Tuttle द्वारा छोड़े गए धूल और छोटे चट्टानी कण फैले हुए हैं।
जब पृथ्वी इन कणों के बीच से गुजरती है तो छोटे कण अत्यधिक गति से वायुमंडल में प्रवेश करते हैं। वायुमंडल में इनके कारण गैसें उत्तेजित और आयनित होती हैं तथा आकाश में कुछ क्षण के लिए चमकीली लकीर दिखाई देती है। इसी घटना को सामान्य भाषा में ‘टूटता तारा’ कहा जाता है। पर्सीड उल्काओं की प्रवेश गति करीब 59 किलोमीटर प्रति सेकंड बताई जाती है।
पर्सियस तारामंडल से जुड़ा है नाम
पर्सीड उल्का वर्षा का रेडिएंट यानी वह आकाशीय क्षेत्र, जहां से उल्काएं आती हुई प्रतीत होती हैं, पर्सियस तारामंडल की दिशा में दिखाई देता है। इसी कारण इसका नाम पर्सीड पड़ा है।
हालांकि उल्काएं वास्तव में पर्सियस तारामंडल से निकलती नहीं हैं। यह पृथ्वी से देखने पर पैदा होने वाला परिप्रेक्ष्य प्रभाव है। उल्काएं आकाश के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई दे सकती हैं। इसलिए केवल पर्सियस तारामंडल को देखने के बजाय खुले आकाश के बड़े हिस्से पर नजर रखना अधिक उपयोगी रहेगा।
धूमकेतु छोड़ता है उल्काओं का मलबा
पर्सीड उल्का वर्षा का स्रोत 109P/Swift-Tuttle धूमकेतु है। इसकी कक्षीय अवधि लगभग 130 वर्ष है। धूमकेतु सूर्य की परिक्रमा करते समय अपने पीछे धूल और छोटे कणों की एक मलबा-धारा छोड़ता है। पृथ्वी हर वर्ष जुलाई-अगस्त में इस क्षेत्र से गुजरती है और इसी दौरान पर्सीड उल्का वर्षा दिखाई देती है।
रंग-बिरंगी क्यों दिखाई देती हैं उल्काएं
उल्काओं में अलग-अलग रंग दिखाई देने का कारण उनके पदार्थ और वायुमंडल की गैसों से जुड़ी प्रक्रियाएं हैं। विभिन्न तत्वों के कारण पीले, हरे, नीले या सफेद जैसे रंग दिखाई दे सकते हैं। तेज गति से वायुमंडल में प्रवेश करने के दौरान उत्पन्न ऊर्जा और गैसों के उत्तेजित होने से यह चमक पैदा होती है।
उल्का और उल्कापिंड में अंतर
अंतरिक्ष में मौजूद छोटे पत्थरीले या धात्विक कण जब पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर चमकते हैं तो उन्हें उल्का कहा जाता है। यदि कोई बड़ा पिंड वायुमंडल को पार करके पृथ्वी की सतह तक पहुंच जाता है तो उसे उल्कापिंड कहा जाता है।
ग्रामीण इलाकों में बेहतर दिख सकता है नजारा
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पर्सीड उल्का वर्षा देखने के लिए किसी विशेष उपकरण की जरूरत नहीं है। साफ मौसम और कम प्रकाश प्रदूषण वाला स्थान चुनना सबसे महत्वपूर्ण है। शहरों में कृत्रिम रोशनी के कारण मंद उल्काएं दिखाई नहीं दे पातीं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में आसमान अपेक्षाकृत अंधेरा होने से अधिक उल्काएं देखी जा सकती हैं।
उन्होंने खगोल प्रेमियों से अपील की कि सुरक्षित स्थान का चयन करते हुए खुले आसमान का आनंद लें और उल्का वर्षा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करें। पर्सीड उल्का वर्षा केवल खूबसूरत खगोलीय दृश्य ही नहीं, बल्कि धूमकेतुओं से निकले पदार्थ और पृथ्वी के वायुमंडल के बीच होने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया को समझने का भी अवसर है।
खगोलविद अमर पाल सिंह, एस्ट्रोनॉमी एजुकेटर, वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामंडल), गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के अनुसार अगस्त की यह खगोलीय घटना विज्ञान एवं खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों और आम लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगी।चाहें तो मैं इसी सामग्री से अमर प्रभात के फ्रंट-पेज लायक और अधिक तड़पदार शीर्षक, दो उपशीर्षक और 500-600 शब्द का विशेष समाचार भी बना सकता हूं।
Budaun Amarprabhat