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इंतजार हुआ समाप्त : ईनामों को देने वाली “जौ जिला बदाऊं है” आपके सामने उपस्थित है अपनी कहानियों को लेकर

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जबस कज मरकदे अहले बसीरत चश्मा-ए-नूर अस्त
बजाय सुरमा दरदीदा कश्म खाके बदाऊन रा

-हजरत अमीर खुसरो
यूं समझो अंतर्मन से देखने वाले इसे सूफी संतों के नेत्रों की ज्योति से प्रकाशित धरती मानते हैं, इसलिए मैं सुरमे की जगह आंखों में बदाऊं की मिट्टी लगाता हूं।
हजरत अमीर खुसरो जिस बदाऊं की खाक सुरमे की जगह अपनी आंखों में लगाते हैं वह “बदाऊं” आज के बदायूं, प्राचीन वेदामऊ या बौद्धमऊ से थोड़ा अलग है। इस बदाऊं में विभिन्न संस्कृतियों की मिठास है। भाषा विविधता है। भोलापन है। अदबी शऊर है। मोहब्बत है। ऐसी पवित्र भूमि की मिट्टी की सौंध को एक किताब के रूप में कैद करने का एक साधारण प्रयास “जौ जिला बदाऊं है” में किया गया है।
भौगोलिक दृष्टि से “बदाऊं” उसावां से ओरछी तक, दातागंज के वेलाडांडी पुल से कछला पुल तक और गुन्नौर तहसील जो प्रशासनिक दृष्टि से अब जिला संभल में है, के गवां तक इस बदाऊं की सीमा व्याप्त है।
इस पुस्तक के किस्से “तुमने कहा मैंने सुना” की परम्परा के संवाहक और करीब-करीब सत्य हैं। पात्रों के नाम कथा-वस्तु की आवश्यकता को ध्यान में रखकर गढ़े गए हैं, इनका वास्तविकता से कोई मेल नहीं है। प्रयास रहा है कथा-वस्तु से किसी पात्र का दिल न दुखे फिर भी यदि ऐसा कोई भाव आ गया है तो उसके लिए अग्रिम क्षमा। एक और जरूरी बात मैं अवश्य रेखांकित करना चाहूंगा-
“इस पुस्तक को दिमाग से नहीं दिल से पढ़िये” इसमें एक फायदा पुस्तक के कथानक के पूर्ण आनंद के रूप में आपको प्राप्त होगा और एक लाभ मुझे मिलेगा कि आप पुस्तक की व्याकरणीय त्रुटि, भाषा व वर्तनी दोष आदि से अवश्य मुझे मुक्त कर देंगे।
“जो जिला बदाऊं है” के एक दो शुरूआती किस्से लिपिबद्ध करने के बाद डरते-डरते दो-चार साहित्यिक मि़त्रों से साझा किए। आश्चर्य हुआ कि सभी ने सराहा, हिम्मत बढ़ाई और उनकी इसी हौंसला-अफजाई का परिणाम आप के सामने है। इस पुस्तक के पाठक दो भागों में वर्गीकृत किए जा सकते हैं पहले, वे लोग जो पुस्तक के कथानक के साथ अपने अनुभव, अपना आनंद और खुद के किस्से के रूप में महसूस करेंगे और दूसरे वे जो कथानक पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहेंगे, “ऐसो हो! हमारो बदाऊं।”
अपनी टिप्पणी को मैं और विस्तार नहीं देना चाहता। कथावस्तु पर भी कोई रेखांकन ठीक नहीं क्योंकि यह काम शुद्ध आपकी जिम्मेदारी है। हां! इतना अवश्य है कि अपने बदाऊं के सम्पूर्ण तो नहीं लेकिन अधिकांश रंगों का प्रयोग इस पुस्तक में किया गया है।
पुस्तक को इस रूप में लाने के लिए जिन लोगों के अमूल्य सुझाव व सहयोग प्राप्त हुआ उनमें दिलकश बदायूंनी, प्रेमस्वरूप पाठक, टिल्लन वर्मा, शमशेर बहादुर आंचल, नरेन्द्र गरल, अशोक प्रियरंजन, अर्चना अवस्थी, डॉ. निशि अवस्थी, योगेश्वर प्रताप सिंह तोमर एड., प्रमिला गुप्ता, आयुषी एड., (सुप्रीम कोर्ट) डॉ. वत्सला, ऋजु गुप्ता, अनादि प्रकाश, अनुपम सारस्वत, अक्षत अशेष, गौहर अली एड., फिरोज अनवर एड., नवजागरण प्रकाशन के प्रकाशक राजकुमार अनुरागी को अवश्य धन्यवाद ज्ञापित करना चाहूंगा।
साहित्य जगत, तोतली भाषा में कहे गए मेरे प्रयास को अन्यथा नहीं लेंगे ऐसा मेरा विश्वास है। संभालिए अपना “जौ जिला बदाऊं है” को। सादर

-स्वतंत्र प्रकाश गुप्त


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