बिल्सी। खगोल प्रेमियों के लिए सितंबर में एक विशेष खगोलीय घटना देखने का अवसर मिलेगा। वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला, गोरखपुर के खगोलविद एवं एस्ट्रोनॉमी एजुकेटर अमर पाल सिंह के अनुसार 9 और 10 सितंबर 2026 की रात एप्सिलॉन पर्सिड्स उल्का वर्षा अपने चरम पर रहेगी। साफ मौसम और प्रकाश प्रदूषण से दूर स्थान पर इसे खुली आंखों से देखा जा सकेगा।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह अगस्त में दिखाई देने वाली प्रसिद्ध पर्सिड्स उल्का वर्षा से अलग है। सितंबर की एप्सिलॉन पर्सिड्स एक छोटी उल्का वर्षा है, लेकिन इस वर्ष इसके अवलोकन के लिए परिस्थितियां अनुकूल रहने की उम्मीद है। खास बात यह है कि इस दौरान चंद्रमा की रोशनी बहुत कम रहेगी, जिससे हल्की उल्काओं को देखने में आसानी हो सकती है।
आधी रात के बाद बेहतर होगा नजारा
अमर पाल सिंह के मुताबिक 9 सितंबर की मध्य रात्रि के बाद से 10 सितंबर की सुबह होने से पहले तक उल्काओं को देखने का अच्छा अवसर रहेगा। आदर्श परिस्थितियों में करीब 5 से 8 उल्काएं प्रति घंटे दिखाई दे सकती हैं। ये उल्काएं लगभग 64 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती हैं।
उल्का वर्षा का रेडिएंट यानी विकीर्णक बिंदु पर्सियस तारामंडल के क्षेत्र में दिखाई देगा। हालांकि उल्काएं केवल इसी दिशा में सीमित नहीं रहतीं और पूरे आकाश में दिखाई दे सकती हैं। इसके लिए किसी टेलीस्कोप या दूरबीन की आवश्यकता नहीं है। अंधेरे में आंखों को अभ्यस्त होने के लिए करीब 30 मिनट का समय देना उपयोगी रहेगा।
शहर की रोशनी से दूर रहना जरूरी
खगोलविद ने बताया कि भारत उत्तरी गोलार्ध में होने के कारण इस उल्का वर्षा को देखने के लिए अनुकूल स्थिति में रहेगा। ग्रामीण या कम प्रकाश प्रदूषण वाले स्थान से इसका बेहतर नजारा मिल सकता है। हालांकि सितंबर में मानसून के कारण बादल रहने पर दृश्यता प्रभावित हो सकती है। इसलिए साफ आसमान होना जरूरी है।
उन्होंने बताया कि उल्का वास्तव में अंतरिक्ष से आने वाले छोटे चट्टानी या धात्विक कण होते हैं, जो पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय गर्म होकर चमकने लगते हैं। इन्हें आम बोलचाल में ‘टूटता तारा’ भी कहा जाता है। अधिकांश उल्काएं वायुमंडल में ही नष्ट हो जाती हैं, जबकि जो पिंड पृथ्वी की सतह तक पहुंचते हैं, उन्हें उल्कापिंड कहा जाता है।
सितंबर वाली पर्सिड्स अगस्त वाली से अलग
अमर पाल सिंह ने बताया कि अगस्त में होने वाली प्रसिद्ध पर्सिड्स उल्का वर्षा और सितंबर की एप्सिलॉन पर्सिड्स को एक नहीं समझना चाहिए। अगस्त की पर्सिड्स का संबंध धूमकेतु स्विफ्ट-टटल (109P/Swift-Tuttle) से है, जबकि सितंबर की एप्सिलॉन पर्सिड्स के मूल धूमकेतु की पहचान अभी स्पष्ट रूप से नहीं हुई है।
उन्होंने बताया कि वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी सितंबर में अंतरिक्ष में मौजूद उस मलबे की धारा से गुजरती है, जिसके कण वायुमंडल में प्रवेश कर चमक पैदा करते हैं। 10 सितंबर की सुबह पृथ्वी के किसी पुराने धूमकेतु-मलबे की धारा से गुजरने की संभावना भी जताई गई है, जिससे कुछ समय के लिए उल्का गतिविधि बढ़ सकती है। हालांकि यह संभावना निश्चित नहीं है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने खगोल प्रेमियों से साफ आसमान में इस खगोलीय घटना का सुरक्षित तरीके से अवलोकन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि सही ज्ञान ही विज्ञान को समझने का आधार है, इसलिए खगोलीय घटनाओं को लेकर भ्रम से बचते हुए वैज्ञानिक तथ्यों को समझना जरूरी है।
Budaun Amarprabhat