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टीएमयू में द गोल्डन ऐज ऑफ यूनिवर्सिटीजःतक्षशिला, नालंदा एंड अदरस द बैकबोन ऑफ द इंडियन एजुकेशन सिस्टम पर मंथन

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तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम्स- सीआईकेएस के तत्वावधान में 16वें राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव में जुड़े देश के नामचीन शिक्षाविद

ख़ास बातें
प्राचीन भारतीय यूनिवर्सिटीज़ वर्तमान और भविष्य की शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रेरणा-स्रोतः प्रो. वाईएस ठाकुर
यूनिवर्सिटीज़ में इंटरसिप्लिनरी फाउंडेशन कॉर्सेंज, कम्युनिटी इंगेजमेंट 2.0 समय की दरकारः प्रो. विनय कुमार नांगिया
श्रवण, मनन, चिंतन को क्रिटिकल थिंकिंग, एनालेटिकल रीजनिंग और रिफ्लेक्टिव लर्निंग से जोड़ना जरूरीः डॉ. प्रियांशा सिंह

मुरादाबाद। डॉ. हरिसिंह गौर यूनिवर्सिटी, सागर के कुलपति प्रो. वाईएस ठाकुर ने कहा, प्राचीन भारतीय यूनिवर्सिटीज़ केवल शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थान नहीं, बल्कि ज्ञान-सृजन, ज्ञान-संरक्षण, अनुसंधान, संवाद और सभ्यतागत आदान-प्रदान के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। प्राचीन भारतीय यूनिवर्सिटीज़ की विरासत केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण प्रेरणा-स्रोत है। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी जैसी संस्थाओं की परंपराओं से बहुविषयक शिक्षा, नैतिकता, अनुसंधान, स्वतंत्र चिंतन, ज्ञान-संरक्षण, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व सरीखे महत्वपूर्ण तत्व आधुनिक उच्च शिक्षा को नई दिशा दे सकते हैं। उन्होंने कहा, अब स्टुडेंट्स को नॉलेज से विज़डम, इन्फॉर्मेशन से अंडरस्टैंडिंग, एजुकेशन से करेक्टर और सोशल रेस्पांसिबिलिटी की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है। प्रो. ठाकुर तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम्स- सीआईकेएस के तत्वावधान में 16वें राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे।

कॉन्क्लेव की थीम द गोल्डन ऐज ऑफ यूनिवर्सिटीजः तक्षशिला, नालंदा एंड अदरस द बैकबोन ऑफ द इंडियन एजुकेशन सिस्टम अर्थात यूनिवर्सिटीज़ का स्वर्णयुगः भारतीय शिक्षा प्रणाली की रीढ़ के रूप में तक्षशिला, नालंदा और अन्य यूनिवर्सिटीज़ रही। कॉन्क्लेव का उद्देश्य प्राचीन भारत के तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी आदि प्रमुख शिक्षा-केंद्रों की शैक्षिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक परंपरा और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में उनकी प्रासंगिकता पर अकादमिक विमर्श करना रहा। कॉन्क्लेव का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना के संग हुआ। चिन्मय विश्व विद्यापीठ, कोच्ची के प्रो. विनय कुमार नांगिया ने प्राचीन भारतीय यूनिवर्सिटीज़ की संस्थागत संरचना, बहुविषयक पाठ्यक्रम, नैतिक शिक्षा, वैश्विक ज्ञान-विनिमय और सामाजिक उत्तरदायित्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा, भविष्य की शिक्षा अपनी सभ्यतागत जड़ों से जुड़ी होने के साथ-साथ वैज्ञानिक, संवैधानिक, समावेशी, सतत और वैश्विक दृष्टिकोण वाली होनी चाहिए। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन में प्रमाण, तर्क, वैज्ञानिक जांच और आलोचनात्मक चिंतन को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा, आधुनिक यूनिवर्सिटीज़ में इंटरसिप्लिनरी फाउंडेशन कॉर्सेंज, कम्युनिटी इंगेजमेंट 2.0 और हेरिटेज एंड इंन्नोवेशन लेबोरेट्रीज सरीखी पहलें समय की मांग है। उनके अनुसार शिक्षा को स्थानीय एवम् सामुदायिक ज्ञान, सांस्कृतिक विरासत, अनुसंधान, नवाचार और सामाजिक समस्याओं के समाधान से जोड़ा जाना चाहिए।

हिंदू कॉलेज मुरादाबाद में डिपार्टमेंट ऑफ इकोनोमिक्स की प्रोफेसर डॉ. प्रियांशा सिंह ने सभ्यतागत स्मृति, ज्ञान-सृजन, प्राचीन भारतीय बौद्धिक परंपरा और आधुनिक यूनिवर्सिटीज़ की भूमिका के बीच संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, ज्ञान केवल सूचना का संग्रह नहीं, बल्कि अंडरस्टैंडिंग और विजडम की ओर बढ़ने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने श्रवण, मनन, चिंतन और तर्क को भारतीय बौद्धिक परंपरा की महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं के रूप में रेखांकित करते हुए इन्हें आधुनिक क्रिटिकल थिंकिंग, एनालेटिकल रीजनिंग और रिफ्लेक्टिव लर्निंग से जोड़ने की आवश्यकता बताई। डॉ. सिंह ने नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी सरीखे शिक्षा-केंद्रों की बहुकेंद्रीय ज्ञान-व्यवस्था और अंतर-क्षेत्रीय ज्ञान-विनिमय पर भी चर्चा करते हुए कहा, आधुनिक यूनिवर्सिटीज़ को ज्ञान, अनुसंधान, नवाचार, उद्यमिता, सामाजिक उत्तरदायित्व और वैश्विक सहयोग के जीवंत केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। टीएमयू के सीआईकेएस की समन्वयक डॉ. अलका अग्रवाल ने कॉन्क्लेव की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बहुविषयक, मूल्य-आधारित एवम् समग्र प्रकृति और एनईपी 2020 के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। संचालन डॉ. माधव शर्मा ने किया। राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ कॉन्क्लेव का समापन हुआ।


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