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महंगे स्कूल, सस्ती सेहत: बच्चों की थाली में परोसा जा रहा ‘छुपा जंक’

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आज के दौर में जब अधिकांश परिवारों में दोनों माता-पिता कामकाजी हैं, सुबह का समय बच्चों के टिफ़िन, होमवर्क और तैयारियों में तेज़ी से निकल जाता है। ऐसे में अभिभावक भारी भरकम फीस देकर नामी स्कूलों का चयन करते हैं, यह भरोसा करते हुए कि स्कूल न सिर्फ़ बेहतर शिक्षा देगा बल्कि बच्चों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध कराएगा।
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
कैंटीन में बिक रहा ‘हेल्दी’ नाम का भ्रम
कई प्रतिष्ठित स्कूलों की कैंटीन में वही पैकेटबंद स्नैक्स धड़ल्ले से बिक रहे हैं, जो पाम ऑयल, रिफाइंड ऑयल, मैदा और व्हाइट शुगर से बने होते हैं। इन उत्पादों में कभी-कभार 10 से 25 प्रतिशत तक फल या अनाज मिलाकर उन्हें “हेल्दी” का टैग दे दिया जाता है, जबकि शेष हिस्सा हानिकारक फैट, प्रिज़र्वेटिव और फ्लेवर एन्हांसर से भरा होता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कुछ बच्चे घर से टिफ़िन लाने के बावजूद कैंटीन की ओर आकर्षित हो जाते हैं। इसकी वजह केवल स्वाद नहीं, बल्कि दोस्तों की नकल, “सब ले रहे हैं तो मैं भी लूँ” वाली मानसिकता और स्कूलों द्वारा दिए जाने वाले पैकेज ऑफर—जैसे कूपन सिस्टम या मॉर्निंग ब्रेक पैक—हैं, जिनमें पैक्ड स्नैक्स और फ्लेवर्ड ड्रिंक्स शामिल होते हैं।
सेहत पर पड़ता सीधा असर
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, पाम ऑयल में लगभग 50 प्रतिशत सैचुरेटेड फैट होता है, जो बच्चों में कम उम्र से ही खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाता है। रिफाइंड ऑयल और मैदा पोषण से लगभग खाली होते हैं, जिससे मोटापा, सूजन और मेटाबॉलिक समस्याएं बढ़ती हैं। वहीं व्हाइट शुगर बच्चों में मीठे की लत डालती है, जो भविष्य में डायबिटीज़ और हृदय रोग का कारण बन सकती है।
आंकड़े डराने वाले हैं। शहरी भारत में लगभग 25 प्रतिशत बच्चे ओवरवेट या मोटापे की श्रेणी में आ चुके हैं। बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले 5–7 वर्षों में बच्चों में फैटी लिवर, हाई कोलेस्ट्रॉल और प्री-डायबिटिक लक्षणों के मामले दोगुने हो गए हैं। हैरानी की बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या उन बच्चों की है जो महंगे और नामी स्कूलों में पढ़ते हैं।
कैंटीन का कारोबार, सेहत की कीमत पर
जमीनी सच्चाई यह है कि कई स्कूल कैंटीनों की 70–80 प्रतिशत बिक्री पैकेट फूड, बेक्ड स्नैक्स और शुगर युक्त ड्रिंक्स से होती है। फल, अंकुरित अनाज, मिलेट्स या ताज़ा भोजन या तो बहुत सीमित मात्रा में होता है या सिर्फ़ दिखावे के लिए रखा जाता है।
जिम्मेदार कौन?
यह सवाल अब टालने लायक नहीं रहा।
सरकार की भूमिका:
स्कूल कैंटीन के लिए सख़्त और स्पष्ट नियम बनाए जाएँ। पाम ऑयल, रिफाइंड ऑयल, मैदा और व्हाइट शुगर के उपयोग पर सीमा तय हो और “हेल्दी” शब्द के इस्तेमाल की सख़्त निगरानी की जाए।
स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी:
कैंटीन केवल मुनाफ़े का साधन न बने। स्कूल प्रबंधन और प्रधानाचार्यों को यह तय करना होगा कि बच्चों की प्लेट में क्या जा रहा है और उसका दीर्घकालिक असर क्या होगा।
माता-पिता की जागरूकता:
महँगी फ़ीस और स्कूल के ब्रांड नेम पर आंख मूंदकर भरोसा करना काफी नहीं। कैंटीन मेनू पर सवाल उठाएँ, पैकेट के इंग्रेडिएंट्स पढ़ें और बच्चों को भी सही चुनाव करना सिखाएँ।
यह सिर्फ़ पसंद का मामला नहीं
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अब व्यक्तिगत स्वाद या पसंद का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। जिस उम्र में बच्चों का शरीर और दिमाग मज़बूत होना चाहिए, उसी उम्र में अगर बीमारियों की नींव रख दी गई, तो उसका असर पूरी ज़िंदगी पर पड़ेगा।
अब समय आ गया है कि स्कूल-कॉलेज कैंटीन को कमाई का केंद्र नहीं, बल्कि सेहत का केंद्र बनाया जाए।
दिखावटी “हेल्दी” से आगे बढ़कर सच्चे पोषण की ओर कदम उठाना ही आने वाली पीढ़ी को बचाने का एकमात्र रास्ता है।


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