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मुख्तार तिलहरी के सम्मान में शायरों ने पेश किया उम्दा कलाम, देर रात तक बंधा रहा समां

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“यह मेरी राय है, फ़तवा नहीं है” से गूंजा मुशायरा

संवाददाता: गोविंद देवल

बदायूं। कारवाने अमजद एकेडमी की ओर से मोहल्ला सोथा स्थित सादिक अलापुरी के आवास पर शाहजहांपुर से आए मेहमान शायर मुख्तार तिलहरी के सम्मान में एक शानदार मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में शहर के नामचीन शायरों ने अपने कलाम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मुशायरे का आगाज़ शाकिर रजा बदायूंनी ने नात के साथ किया। उन्होंने पढ़ा—
“मुझको तयबा में बुलाएंगे हुजूर,
अपना दीदार कराएंगे हुजूर।”
इसके बाद राजवीर सिंह तरंग ने अपने अंदाज में कहा—
“लब पर खुदा के नाम को रटता चला गया,
दुनिया की उलझनों से मैं बचता चला गया।”
अरशद रसूल की ग़ज़ल ने खूब वाहवाही लूटी, खासकर यह शेर—
“अगर जहमत न हो इंसान बन जा,
यह मेरी राय है, फ़तवा नहीं है।”
संचालन कर रहे उज्ज्वल वशिष्ठ ने भी अपने कलाम से रंग जमाया, जबकि मेजबान सादिक अलापुरी ने कहा—
“गश्त करती हैं खुशबुएँ उस दम,
जब कलंदर ज़मीं पे सोता है।”
अहमद अमजदी बदायूंनी ने पढ़ा—
“शराफ़त का सौदा हम न कर सकेंगे,
हमारे लिए ये कमाई बहुत है।”
सुरेंद्र नाज़ की ग़ज़ल—
“एक तू ही सफर में अपना था,
सीट तू भी बदल के बैठ गया।”
ने भी श्रोताओं की खूब तालियां बटोरीं।
मुख्य अतिथि मुख्तार तिलहरी ने बदायूं को उर्वरा साहित्यिक धरती बताते हुए नए रचनाकारों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने अपना कलाम सुनाया—
“जिंदगी को जिंदगी भर जिंदगी समझा मगर,
जिंदगी फिर भी तलाशे जिंदगी करती रही।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. मुजाहिद नाज़ ने भी अपने विचार और शेर प्रस्तुत किए। अंत में अहमद अमजदी बदायूंनी व सादिक अलापुरी ने सभी अतिथियों व श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।


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