लेखिका – सुनीता कुमारी, पूर्णियां (बिहार)
भारतीय पंचांग और सनातन परंपरा में “अधिकमास” का विशेष महत्व माना गया है। इसे सामान्य भाषा में “मलमास” अथवा “पुरुषोत्तम मास” भी कहा जाता है। यह मास लगभग प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार आता है और इसका उद्देश्य चंद्र वर्ष तथा सौर वर्ष के बीच उत्पन्न अंतर को संतुलित करना होता है। भारतीय कालगणना की यही विशेषता उसे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से अद्वितीय बनाती है।
क्या है अधिकमास?
हिंदू पंचांग मुख्य रूप से चंद्रमा की गति पर आधारित है। एक चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का माना जाता है। इस प्रकार दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर उत्पन्न हो जाता है।
यदि इस अंतर को संतुलित न किया जाए तो ऋतुएं और पर्व अपने निर्धारित समय से आगे-पीछे होने लगेंगे। इसी अंतर को समायोजित करने के लिए लगभग 32 महीने 16 दिन 8 घंटे के बाद एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
अधिकमास कब आता है?
हिंदू पंचांग में सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को “संक्रांति” कहा जाता है। जब किसी चंद्र मास के भीतर सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती, तब वह मास “अधिकमास” कहलाता है। उदाहरण स्वरूप यदि आषाढ़ मास में सूर्य राशि परिवर्तन न करे, तो वह “अधिक आषाढ़” कहलाता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से अधिकमास
अधिकमास भारतीय खगोल विज्ञान की उत्कृष्ट व्यवस्था का उदाहरण है। पश्चिमी देशों में वर्ष के संतुलन हेतु “लीप ईयर” में एक अतिरिक्त दिन जोड़ा जाता है, जबकि भारतीय पंचांग में पूरा एक अतिरिक्त मास जोड़कर समय संतुलन स्थापित किया जाता है।
यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय ऋषियों को सूर्य और चंद्रमा की गति तथा समय गणना का गहन ज्ञान था। उनकी बनाई व्यवस्था आज भी ऋतुओं, पर्वों और कृषि चक्र को संतुलित बनाए हुए है।
धार्मिक महत्व
सनातन धर्म में अधिकमास को भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है, इसलिए इसे “पुरुषोत्तम मास” कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस मास में किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने इस मास को अपना नाम देकर विशेष सम्मान प्रदान किया था। इसी कारण श्रद्धालु इस दौरान भक्ति, साधना और सेवा कार्यों में विशेष रुचि लेते हैं।
अधिकमास में क्या करें?
इस मास में आध्यात्मिक और धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व माना गया है। इस दौरान—
भगवान विष्णु की पूजा और मंत्र जाप
गीता, रामायण और भागवत कथा का पाठ
दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता
व्रत एवं उपवास
सत्संग और भजन-कीर्तन
तुलसी पूजा एवं दीपदान
जैसे कार्य अत्यंत शुभ माने जाते हैं।
किन कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है?
परंपरागत मान्यताओं के अनुसार अधिकमास में कुछ मांगलिक कार्यों को टालना उचित माना गया है, जैसे—
विवाह
गृह प्रवेश
मुंडन संस्कार
भूमि पूजन
नया व्यवसाय आरंभ करना
हालांकि दैनिक पूजा-पाठ और शुभ कर्मों पर कोई प्रतिबंध नहीं माना गया है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
अधिकमास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्ममंथन और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर भी है। इस दौरान समाज में कथा, सत्संग, भजन और सेवा कार्यों का आयोजन होता है, जिससे नैतिक मूल्यों और सामाजिक जागरूकता को बल मिलता है।
निष्कर्ष
अधिकमास भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिक सोच और आध्यात्मिक परंपरा का अद्भुत संगम है। यह न केवल समय संतुलन की खगोलीय व्यवस्था को दर्शाता है, बल्कि मनुष्य को आत्मशुद्धि, संयम और ईश्वर भक्ति की प्रेरणा भी देता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में अधिकमास को अत्यंत पवित्र, कल्याणकारी और आध्यात्मिक उन्नति का श्रेष्ठ काल माना गया है।
Budaun Amarprabhat