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नारी शक्ति और सुशासन की प्रतीक का कार्यक्रम रोकना भाजपा की महिला विरोधी मानसिकता: आशीष यादव

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अहिल्याबाई होलकर जयंती कार्यक्रम पर रोक, सपा ने बताया भाजपा का तुगलकी फरमान
प्रशासनिक अनुमति न मिलने पर बदायूं में सियासी पारा चढ़ा, सपा कार्यकर्ताओं ने जताया तीखा विरोध

अमर प्रभात ब्यूरो
बदायूं। जनपद में लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की जयंती पर आयोजित होने वाले भव्य कार्यक्रम को जिला प्रशासन से अनुमति न मिलने के कारण राजनैतिक घमासान चरम पर पहुंच गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस प्रशासनिक रोक को सत्ताधारी भाजपा सरकार का तुगलकी फरमान करार देते हुए इसका तीखा विरोध किया है। इस फैसले के बाद से जिले का सियासी पारा पूरी तरह से गरमा गया है।


अंतिम समय में पलटा प्रशासन, तैयारियां हुईं प्रभावित
पाल समाज और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा ३१ मई को अहिल्याबाई होलकर जयंती के अवसर पर बदायूं में एक बड़े और भव्य कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी। कार्यक्रम की मुख्य संयोजक सुनीता पाल ने प्रशासन पर वादाखिलाफी का सीधा आरोप लगाते हुए कहा, “हम लगातार प्रशासनिक अधिकारियों के संपर्क में थे और हमें अंत तक भरोसा दिया गया था कि अनुमति मिल जाएगी। हमारी सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, लेकिन ऐन मौके पर भाजपा सरकार के इशारे पर अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया गया। यह पिछड़े समाज की आवाज को दबाने की एक सोची-समझी साजिश है।”


पिछड़े वर्ग के महापुरुषों से डरती है भाजपा: सपा जिलाध्यक्ष
सपा जिलाध्यक्ष आशीष यादव ने प्रशासनिक फैसले पर गहरा रोष प्रकट करते हुए सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि लोकमाता अहिल्याबाई होलकर नारी शक्ति, न्याय और सुशासन की वैश्विक प्रतीक हैं, उनका कार्यक्रम रोकना लोकतंत्र की हत्या के समान है। जिलाध्यक्ष ने आरोप लगाया, “भाजपा हमेशा से महिला विरोधी मानसिकता रखती है। अहिल्याबाई खुद एक महान महिला शासक थीं, जिनके सम्मान में आयोजित होने वाले कार्यक्रम पर रोक लगाकर भाजपा ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है। सत्ता पक्ष असल में पिछड़े वर्ग के महापुरुषों और उनके आदर्शों से डरता है।” आशीष यादव ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जनता इस अपमान को भूलेगी नहीं और वर्ष २०२७ के विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका करारा जवाब देगी।

कानून-व्यवस्था का हवाला, आंदोलन की चेतावनी
इस पूरे घटनाक्रम के बाद पाल समाज और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इसे समाज का बड़ा अपमान बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक प्रशासनिक हलकों में इस रोक के पीछे सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक लिखित बयान सामने नहीं आया है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे पर पीछे न हटने का संकल्प दोहराते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है और कहा है कि महापुरुषों के सम्मान के साथ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाएगा।


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