बिल्सी । हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में मदन मोहन मालवीय शिक्षा समिति उत्तर प्रदेश परौली के तत्वावधान में ‘हिंदी उत्सव विचार मंच’ पर साहित्यकार संगोष्ठी का आयोजन मदन मोहन मालवीय स्कूल, परौली में किया गया। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े साहित्यकारों एवं कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी भाषा, साहित्य, संस्कृति, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाओं और आध्यात्मिक चिंतन के विभिन्न रंग प्रस्तुत किए। साहित्यिक रचनाओं से कार्यक्रम स्थल देर तक गुंजायमान रहा। कार्यक्रम में हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और उसके महत्व को लेकर साहित्यकारों ने अपनी-अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। रमेश चंद्र मिश्रा ‘परौली’ ने हिंदी की उत्पत्ति और देवनागरी लिपि की पहचान को अपनी रचना का विषय बनाते हुए हिंदी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का भाव प्रस्तुत किया। डॉ. सतीश चंद्र शर्मा ‘सुधांशु’, बिसौली ने हिंदी दिवस के आयोजन को केवल एक दिन तक सीमित न रखने का संदेश देते हुए हिंदी के प्रति निरंतर सम्मान और प्रयोग की आवश्यकता पर अपनी रचना के माध्यम से विचार रखे। ओजस्वी जौहरी, बिल्सी ने सामाजिक परिस्थितियों और बदलते मानवीय मूल्यों पर आधारित रचना प्रस्तुत की। उनकी कविता के माध्यम से समाज में हो रहे बदलावों और मानवीय संवेदनाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। राजीव उपाध्याय ने हिंदी भाषा और व्याकरण की बारीकियों को काव्यात्मक अंदाज में प्रस्तुत किया। स्वर, व्यंजन, अनुस्वार और विराम चिह्नों को अपनी रचना में स्थान देकर उन्होंने हिंदी की भाषायी विशेषताओं को रोचक ढंग से सामने रखा। विष्णु असावा, बिल्सी ने प्रेम और सौंदर्य की भावनात्मक अभिव्यक्ति से जुड़ी रचना प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव-विभोर किया। उनकी रचना में श्रृंगार और मनोभावों की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिली। कवि आकाश पाठक ने हिंदी के सम्मान, प्रचार-प्रसार और राष्ट्रभावना को केंद्र में रखते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की। उनकी कविता में हिंदी को देश की शान बताते हुए भाषा के व्यापक प्रयोग का संदेश दिया गया। विजय कुमार सक्सेना ‘विजय’, बिसौली ने अंकों के माध्यम से आध्यात्मिक चिंतन को काव्य रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने एक से नौ तक के अंकों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए ‘एक’ को परमपिता परमेश्वर की एकता से जोड़कर दार्शनिक भाव प्रस्तुत किए। इसी क्रम में देव ठाकुर, बिल्सी ने हिंदी के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा— “माना कि आज की पीढ़ी को, थोड़ा कम समझ में आता हूँ, पर सच तो ये है दोस्तों, मैं हर धड़कन में बस जाता हूँ।” इन पंक्तियों के माध्यम से बदलते समय में हिंदी के प्रति नई पीढ़ी के जुड़ाव और भाषा की भावनात्मक गहराई को रेखांकित किया गया। रचना को उपस्थित साहित्य प्रेमियों ने सराहा। संगोष्ठी में प्रस्तुत रचनाओं में हिंदी भाषा के अलग-अलग स्वरूप देखने को मिले। किसी रचना में हिंदी और देवनागरी की महत्ता उभरकर सामने आई तो किसी में सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदना, प्रेम, आध्यात्मिकता और राष्ट्रभावना को स्वर मिला। कवियों की विविध रचनाओं ने कार्यक्रम को साहित्यिक एवं भावपूर्ण वातावरण प्रदान किया। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और भावनाओं से जुड़ी भाषा है। साहित्य समाज को विचार देता है और भाषा उस विचार को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम बनती है। ऐसे साहित्यिक आयोजनों से स्थानीय स्तर पर रचनाकारों को मंच मिलने के साथ-साथ नई पीढ़ी में साहित्य के प्रति रुचि भी विकसित होती है। आयोजकों ने कहा कि हिंदी को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखते हुए उसे साहित्य, संस्कृति, विचार और जनसंवाद की भाषा के रूप में आगे बढ़ाना आवश्यक है। साहित्यकार संगोष्ठी के माध्यम से रचनाकारों को अपनी अभिव्यक्ति रखने का अवसर मिला और उपस्थित लोगों को हिंदी साहित्य के विविध रंगों से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ। कार्यक्रम में साहित्यकारों, हिंदी प्रेमियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं क्षेत्र के गणमान्य लोगों की सहभागिता रही। साहित्यिक प्रस्तुतियों और विचारों से सजी संगोष्ठी ने उपस्थित लोगों को हिंदी के प्रति सम्मान और साहित्य से जुड़ाव का संदेश दिया। संवाद
Budaun Amarprabhat