बदायूँ। अदबी रिवायतों और शायरी की ऐतिहासिक सरज़मीं बदायूँ में ‘बज्म चराग-ए-सुख़न’ के तत्वाधान में शुक्रवार रात मासिक तरही मुशायरे का शानदार आयोजन किया गया। मोहल्ला सोथा स्थित कार्यालय फरशोरी मंजिल पर सजी इस महफ़िल की सदारत मशहूर उस्ताद शायर डॉ. मुजाहिद नाज़ बदायूंनी ने की, जबकि मुशायरे का सफल व खूबसूरत संचालन डॉ. शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने तरह में किया। मुशायरे के लिए निर्धारित मिसरा-ए-तरह “मेरे क्यों मुझसे बरहम हैं” पर फनकारों ने एक से बढ़कर एक बेहतरीन कलाम पेश कर साहित्यिक माहौल को खुशनुमा बना दिया।
मुशायरे का बाकायदा आग़ाज़ सादिक अलापुरी ने तरही नात-ए-पाक से किया—
गुंबदे खिजरा वो देखेंगी,
हिज्र में आँखें जो पुरनम हैं।
महफ़िल की सदारत फरमा रहे उस्ताद शायर डॉ. मुजाहिद नाज़ बदायूंनी ने सामाजिक विसंगतियों पर चोट करते हुए पढ़ा—
चोरी करें भगवान के घर में,
ऐसे चोर बहुत ही कम हैं।
वरिष्ठ शायर सुरेंद्र नाज़ बदायूंनी ने मानवीय रिश्तों पर रोशनी डालते हुए कलाम पेश किया—
आपस के झगड़े का कारण,
थोड़ा तुम हो थोड़ा हम हैं।
निज़ामत कर रहे डॉ. शम्स मुजाहिदी बदायूंनी ने अपने शे’र से समां बांध दिया—
उतरा चेहरा पलकें नम हैं,
जब से उनसे बिछड़े हम हैं।
सादिक अलापुरी ने कौमी एकता और यकजहती का पैगाम देते हुए पढ़ा—
छोड़ो सब आपस के झगड़े,
हम सब औलादे आदम हैं।
आज़म फ़रशोरी ने अपने मख़सूस अंदाज़ में जिंदगी के अहसास को बयां किया—
एक समय में दो मौसम हैं,
लब हंसते हैं आँखें नम हैं।
कुमार आशीष ने अपने पुरकशिश तरन्नुम में रब की नेमतों का जिक्र करते हुए पढ़ा—
दौलत, शोहरत, इज़्ज़त, बरकत,
ये सब रब के रहम-ओ-करम हैं।
अशफाक बदायूंनी ने जिंदगी के दर्द को अल्फाज देते हुए कहा—
वक़्त ने कुछ भी बदला नहीं है,
हम पे सितम थे, हम पे सितम हैं।
अरशद रसूल ने व्यवस्था और हक की आवाज बुलंद करते हुए पढ़ा—
ज़ुल्म सहे हैं हंसकर सारे,
चीख उठे तो बागी हम हैं।
महफ़िल में शहाबुद्दीन शब्बू भाई, रजत गौड़, आहिल रसूल सहित बड़ी तादाद में साहित्यप्रेमी मौजूद रहे, जिन्होंने हर शेर पर ‘मुकर्रर-मुकर्रर’ की सदाएं लगाकर शायरों की जमकर हौसलाअफजाई की। अंत में डॉ. शम्स मुजाहिदी ने सभी का शुक्रिया अदा करते हुए घोषणा की कि इस सिलसिले का अगला मासिक तरही मुशायरा 7 नवंबर को आयोजित होगा, जिसके लिए मिसरा-ए-तरह “तुम अपना रास्ता आसान रखना” तय किया गया है और कुमार आशीष को इसका संयोजक बनाया गया है।
Budaun Amarprabhat